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गैंगस्टर अमन साहू को सीआईडी ने कोर्ट कस्टडी से रिमांड पर मांगा

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सीआईडी अमन से खोलवाएगी फरारी का राज

अजय निराला /  उज्ज्वल दुनिया संवाददाता/ हजारीबाग। गैंगस्टर अमन साहू को बड़कागांव थाना से फरारी के संबंध में दर्ज कांड संख्या 169/2019 में सीआईडी ने गुरुवार को रिमांड पर लेने के लिए आवेदन दिया है। कोर्ट ने आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से अमन साहू को रांची जेल से कस्टडी में ले लिया। अमन साहू के फरारी मामले में दर्ज हुए केस को अब तक सीआईडी ने फर्जी माना है। इस कांड के सूचक भुवनेश्वर पासवान ने स्पष्ट तौर पर कांड में दर्ज तथ्यों से हटकर बयान दिया था।दर्ज केस में कहा गया था कि हाजत से शौच के लिए निकला अमन साहू चौकीदार के गुप्तांग पर हमला कर हथकड़ी सहित फरार हो गया था। लेकिन सूचक भुवनेश्वर पासवान ने सीआईडी को दिए अपने बयान में कहा कि बर्खास्त दारोगा मुकेश कुमार के कहने पर उसे गेस्ट हाउस में रखा गया था। सुबह जब वह चाय देने गए तो उसे नहीं पाया।

इसके अलावे इस मामले में तत्कालीन दारोगा मुकेश कुमार, बड़कागांव के तत्कालीन एसडीपीओ अनिल सिंह सहित अन्य से सीआईडी पुछताक्ष कर चुकी है। सूत्रों की मानें तो सीआईडी ने सभी के बयान में  काफी विरोधाभास पाया है।

अब कांड का अब असली राज अमन साहू सीआईडी के समक्ष खोलेगा। सीआईडी ने अब तक सभी से लिए बयान के विरोधाभास के अंतर से निकले के कई सवाल तैयार कर लिया है। सीआईडी अब अमन के फरारी में  पुलिस की भूमिका संदिग्ध मानते हुए। इस बिंदु पर जांच की दिशा आगे बढ़ा दिया है कि अमन को न सिर्फ थाने से भगाया गया, बल्की उसके फरारी में पुलिस ने नयी कहानी बना कर फर्जी केस भी दर्ज किया। इसके पीछे किस-किस की भूमिका रही और पुलिस ने ऐसा क्यों किया। उरीमारी में अमन के गिरफ्तारी उसके फरारी के बाद तो नहीं बनाई गई। फिर सवाल उठ रहा है कि अमन को किस अधिकारी के आदेश पर बड़कागांव थाना में बतौर गेस्ट के रूप में क्यों रखा गया। सीआईडी ने अब इस दिशा में जांच आगे बढ़ा दिया है कि बड़कागांव थाना से अमन को न सिर्फ सुरक्षित भगाया गया बल्कि उसके फरारी के मामले में गलत कहानी बना चौकीदार के बयान पर फर्जी केस क्यों किया ? इस मामले में कौन-कौन शामिल था? 

सीआईडी इस बात का पता लगा रही है कि बड़कागांव से भगाने के बाद उसकी फरारी का केस करने के लिए भागने के बाद उरिमारी में कांड संख्या 161/19 में गिरफ्तारी तो नहीं बताया ?
सवाल इस लिए उठ रहा है कि जब अमन उरिमारी में गिरफ्तार हो चुका था तो उसे कोर्ट न भेजकर बड़कागांव में क्यों और किसके आदेश पर किस केस में बड़कागांव थाना में रखा गया था ?

हनीट्रैप की सियासी क्रोनोलोजी समझिये; सियासत समझ जायेंगे

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हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था…… शेष तो आप सब को पता ही होगा. बड़ी शोहरत नसीब पंक्तियाँ हैं.कई फिल्मों में नायक के मुंह से, शेरो-शायरी की महफ़िल में और नेता श्रेष्ठ के मुखारविंद से आप भी सुन ही चुके होंगे.

फिलहाल उपरोक्त पंक्तियों से बेबाक आरंभ के कारण पर आ जाता हूँ. सूबे झारखंड में पूर्व में सत्तारूढ़ रही रघुबर दास के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार और भारतीय जनता पार्टी की झारखंड इकाई में फिलहाल उपरोक्त पंक्तियों को चरितार्थ करते नेताओं की गतिविधि बढ़ गई है. शीघ्र ही सियासी हनीट्रैप की कोई नई खबर सुर्खियां बटोरने लगे तो आश्चर्य मत कीजियेगा! हनीट्रैप के साथ-साथ दोस्ताना और शुभमंगल ज्यादा सावधान जैसी फिल्म की नवीन पठकथा उजागर हो तो भी आश्चर्य मत कीजियेगा!
विनती है कि मुझे वर्तमान हेमंत सरकार के प्रशस्ति गायक के विशेषण से विभूषित करने से पूर्व पूरा बेबाक पढ़ जरूर लीजियेगा.

भूमिका हो गयी. चलिये अब आते हैं मूल मुद्दे “हनीट्रैप की सियासी क्रोनोलोजी… ” पर. देश की बात फिर कभी, फिलहाल सूबे झारखंड की बात कर लेते हैं. पिछले दिनों गोड्डा के भाजपा सांसद निशिकांत दूबे ने सूबे के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के चरित्र हनन के लिये मुंबई के मसले का मसाला बनाया. सोशल मीडिया प्लेटफार्म से होती हुई अखबारों तक में उक्त प्रकरण की सुर्खियां बनीं.

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और गोड्डा लोकसभा क्षेत्र के सांसद डॉ निशिकांत दुबे के बीच ट्विटर पर छिड़ी जंग कोर्ट भी पहुंच गयी. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा सदस्य निशिकांत दुबे के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा दर्ज करवा दिया है. मुख्यमंत्री की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर और फेसबुक को भी प्रतिवादी बनाया गया है.

सूबे के अन्य मुद्दे यथा- रोजगार, विकास, सुशासन आदि नेपथ्य में और पाॅलिटीक्स की जगह ले ली माॅलिटीक्स ने. तय मानिये,थोड़े दिनों में ही लोग भूल भी जायेंगे.

ऐसे प्रकरणों पर बेबाक विवेचन से पहले झारखंड के पुराने सियासी पन्ने पलट लीजिये. मुख्यमंत्री के दिवंगत अग्रज दुर्गा सोरेन जी निशिकांत दूबे के अच्छे मित्र थे. कांग्रेस को पटखनी देने के लिए निशिकांत जी ने दुर्गा जी को लोकसभा चुनाव के अखाड़े में भी उतरवा लिया था. हाल के दिनों में भी स्वर्गीय दुर्गा सोरेन की पत्नी व हेमंत सोरेन की भाभी झामुमो विधायक सीता सोरेन के द्वारा अपनी ही सरकार के खिलाफ उठाये गये मुद्दों पर निशिकांत दूबे के समर्थन राग की सुर्खियां भी आपने देखी होंगी.

अब दूसरे मुद्दे पर आते हैं. फिलहाल भाजपा के बाघमारा विधायक ढुल्लू महतो की भाजपा महिला नेत्री के यौनशोषण मामले में मुकदमा, भागमभाग और जेल यात्रा आदि से जुड़ी सुर्खियां याद ही होंगी.
भाजपा में पुनर्वापसी कर लौटे बाबूलाल मरांडी के तत्कालीन जेवीएम के कद्दावरों में से एक रहे ढुल्लू महतो भी थे. बाद में रघुबर दास के खेमे में भाजपाई हुये ढुल्लू महतो बाबूलाल मरांडी के निशाने पर भी आये.
फिर समय बदला और बाबूलाल मरांडी भाजपा के हो गये तो ढुल्लू महतो के घर जाकर उन्होंने यौन शोषण प्रकरण में उन्हें क्लीन चिट भी दे डाली. पूर्व में भाजपा की नेत्री रही पीड़ित महिला फिलहाल कांग्रेस में हैं.
एक और प्रकरण. बाबूलाल मरांडी के दाहिने हाथ कहे जाने वाले विधायक प्रदीप यादव. ठीक चुनाव के पहले हनीट्रैप के फेर में पड़े. भागमभाग और जेल यात्रा हुई.बाबूलाल मरांडी ने पल्ला झाड़ लिया. मामला फिलहाल सुर्खियों से गायब और प्रदीप यादव सत्ताधारी सहयोगी कांग्रेस के खेमे में.
झारखंड प्रदेश भाजपा में भी फिलहाल सांगठनिक खींचतान जारी है.कई रूष्ट नेता वरिष्ठों के हनीट्रैप और दोस्ताना को सुर्खियों में भेजने को बेताब हैं.
किसी को पद नहीं पाने का मलाल है तो कोई अपनी अनदेखी से रूष्ट. कुछेक पूर्ववर्ती महारथी तो किसी नेत्री विशेष को संगठन में शामिल किये जाने को लेकर कुपित हैं.

सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखने और हटवाने के साथ-साथ सुर्खियां बनाने वाले पत्रकारों को भी साधने की कवायद जारी है.

हफ्ते-पखवाड़े में हनीट्रैप और दोस्ताना से जुड़ा कोई मामला सुर्खियां बटोर रहा हो तो चौंकियेगा नहीं. सियासी हनीट्रैप की क्रोनोलाजी यही रही है.बंदूक वही रहता है सिर्फ निशाना बदल जाता है.
हां झारखंड के परिप्रेक्ष्य में दोस्ताना और शुभ मंगल सावधान सरीखी सुर्खियों में कुछ नयापन जरूर दिखेगा.
मेरा बेबाक चिंतन ये है कि जिस देश में पिछले साल यानी 2019 में 30 हजार से ज्यादा दिहाड़ी मजदूर और 10 हजार से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं, जिसकी रिपोर्ट एनसीआरबी के आंकड़ों में सबके सामने है.उस देश के किसी भी सियासी दल को इससे कोई सरोकार नहीं है.
जहां 2019-20 की जीडीपी 4 के आसपास सिमट चुकी थी, जो कोरोना आपदा की पहली तिमाही में ऐतिहासिक निगेटिव आंकड़े पर जा पहुंची है, उस देश की अर्थव्यवस्था से किसी को लेना-देना नहीं है.
जहां रोजाना लाखों युवा रोजगार की मांग को लेकर आवाज़ उठा रहे हैं, वहां किसी भी दल और उसके नेता को भयावह बेरोज़गारी की स्थिति में सुधार की चिंता नहीं है.

विपरीत परिस्थितियों के बावजूद कोरोना काल में कृषि क्षेत्र 3.4 फीसदी विकास दर के साथ आत्मनिर्भरता की प्रेरणा बनकर उभरा है, वहां इसकी सकारात्मकता को गति देने की दूरदर्शिता कोई नेता नहीं दिखा रहा.

कोरोना की मार के बीच लाखों बच्चे किस तरह मेडिकल-इंजीनियरिंग परीक्षा दे रहे हैं के साथ- साथ सूबे झारखंड की बुनियादी समस्याओं, मौजूदा दौर की चुनौतियों, जन सरोकार नेपथ्य में.
अब तो आप भी सियासी हनीट्रैप की बिसात पर राजनीतिक भविष्य तलाशते नेताओं की क्रोनोलाजी समझ ही चुके होंगे.

हेमंत जी, आप तो फिलहाल नायक की भांति सूबे की बेहतरी में दत्तचित्त रहिये. किसकी डिग्री फर्जी है और कौन कैसे सुर्खियां बटोर रहा है ,इन प्रकरणों में वक्त जाया न करें. सरकार बने 8 महीने होने को हैं और धरातल के हालात आपसे छुपे भी नहीं. हूजूर, याद रखियेगा जनसरोकार ही सरकार होती है.

21 सितम्बर से खुलेंगे झारखंड के स्कूल, 50 फीसदी छात्र और टीचर आएंगे

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उज्ज्वल दुनिया/ रांची । पिछले साढ़े पांच महीने से बंद स्कूलों को तस्वीर अब बदलने वाली है। 21 सितंबर से राज्य के सभी सरकारी 10वीं और 12वीं के स्कूल खुलेंगे। इन स्कूलों में 50 प्रतिशत तक टीचिंग और नॉन टीचिंग स्टाफ आएंगे। 21 सितंबर से 9वीं कक्षा से 12वीं कक्षा के छात्र भी अपने-अपने स्कूलों में अपनी मर्जी से जा सकेंगे। अगले साल होने वाली मैट्रिक और इंटर की परीक्षा देने वाले बच्चे भी स्कूल आ सकेंगे। इन सब बच्चों के लिए कक्षाएं नहीं चलेंगी। 

बच्चे मौजूद शिक्षकों से परामर्श और मार्गदर्शन लेने, अपनी दुविधा और अपने सवाल पूछने के लिए स्कूल आएंगे। स्कूल आने के पूर्व बच्चों के पास उनके अभिभावकों का अनुमति पत्र होना जरूरी है। बगैर अनुमति पत्र के वे स्कूल नहीं आ सकते हैं।

रोटेशन के आधार पर शिक्षकों को एक दिन गैप कर स्कूल आना होगा 

रोटेशन के आधार पर सभी शिक्षकों को एक दिन का गैप कर स्कूल आना होगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय के गाइडलाइन के आधार पर झारखंड शिक्षा परियोजना ने यह प्रस्ताव बनाया है। परियोजना ने यह प्रस्ताव माध्यमिक शिक्षा निदेशालय को भेजा है, जिस पर शुक्रवार को बैठक होगी। उसके बाद इस प्रस्ताव को स्वीकृति के लिए आपदा प्रबंधन विभाग को भेजा जाएगा। 

कंटोनमेंट जोन के बाहर के स्कूल ही खुलेंगे

21 सितंबर से सिर्फ वे ही स्कूल खुलेंगे, जो कंटोनमेंट जोन के बाहर के हैं। स्कूलों में भी सिर्फ कंटोनमेंट जोन के बाहर के ही छात्र-छात्राएं परामर्श के लिए आ पाएंगे। फिलहाल अनलॉक-4 की गाइडलाइन को ध्यान में रखते हुए यह छूट मिल पाएगी।

स्कूलों को स्वास्थ्य मंत्रालय के गाइडलाइन को फॉलो करना होगा

गृह मंत्रालय ने यह भी साफ किया कि छूट के दौरान स्कूलों को स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी किए गए गाइडलाइंस को फॉलो करना होगा। गृह मंत्रालय ने अपने दिशा-निर्देशों में यह भी कहा कि कोई भी स्कूल 30 सितंबर तक अपने यहां नियमित कक्षाएं नहीं ले सकेगा। ये सभी संस्थान नियमित एक्टिविटी के लिहाज से 30 सितंबर तक पूरी तरह से बंद रहेंगे, पर 9वीं से 12वीं तक बच्चे यदि अपने अभिभावकों का सहमति पत्र लेकर आएं तो उनकी समस्याओं का समाधान करना होगा।शिक्षकों और छात्रों को कोविड-19 नियमों का करना होगा ।  सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए एक कक्षा में 10-15 छात्र ही बैठ पाएंगे। बारी-बारी से छात्र शिक्षकों के पास जाकर अपनी समस्याओं का हल पूछेंगे।

हम केंद्र की गाइडलाइन के अनुसार चलेंगे : जगरनाथ महतो

शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो ने कहा कि वे केंद्र की गाइडलाइन के अनुसार चलेंगे। गृह मंत्रालय के गाइडलाइन के आधार पर तैयार प्रस्ताव को आपदा प्रबंधन विभाग को भेजा जाएगा।

जेईपीसी के प्रस्ताव को आपदा को भेजा जाएगा : जटाशंकर चौधरी

माध्यमिक शिक्षा निदेशक जटाशंकर चौधरी ने कहा कि जेईपीसी के प्रस्ताव को आपदा प्रबंधन को भेजा जाएगा। अभी स्कूलों में कक्षाएं नहीं चलेंगी। आपदा प्रबंधन की अनुमति के बाद बच्चे परामर्श के लिए स्कूल आ सकते हैं।

1932 के खतियान के आधार पर ही होगी शिक्षकों की बहाली

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सिर्फ झारखंड के लोगों को ही मिलेगी शिक्षक की नौकरी
दूसरे राज्य के लोगों के लिए अब झारखंड में वैकेंसी नहीं

उज्ज्वल दुनिया/बोकारो : झारखंड के शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो ने गुरुवार को एक बार फिर बड़ा बयान दिया है । उन्होंने कहा है कि झारखंड की स्थानीय नीति का आधार 1932 का खतियान होगा ।  साथ ही शिक्षा मंत्री ने कहा कि झारखंड में इसी राज्य के लोग शिक्षक बनेंगे ।  दूसरे राज्य के लोग अब झारखंड में शिक्षक नहीं बन पायेंगे ।

रघुवर दास की 1985 वाली स्थानीय नीति कुड़े में डालने लायक

जगरनाथ महतो ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रघुवर दास की सरकार के 1985 के स्थानीय नीति का कोई आधार नहीं है ।  उसे तो हमने कुड़े में डालने लायक समझा है ।  स्थानीय नीति का आधार 1932 का खतियान है, उसी को तय मानकर आगे के लिए स्थानीय नीति बनेगी ।  

बिहारी नहीं अब सिर्फ झारखंडी बन सकेंगे शिक्षक 

जगरनाथ महतो ने कहा है कि बिहार में बिहारी शिक्षक की तर्ज पर झारखंड में भी झारखंड के लोग ही शिक्षक बनेंगे । उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय नीति का आधार 1985 नहीं होगा । इसका आधार 1932 ही होगा क्योंकि झारखंड का यही आधार है । शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो ने कहा कि एकीकृत बिहार में झारखंड की स्थानीय नीति का आधार वर्ष 1932 ही था । इसलिए झारखंड में उसे ही लागू किया जायेगा ।

काम पर लौटें मनरेगाकर्मी, सरकार कर रही है मांगों पर विचार

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उज्ज्वल दुनिया /रांची: राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम ने कहा है कि हड़ताली मनरेगाकर्मी काम पर लौटे, राज्य सरकार उनकी हर मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने को तैयार है। उन्होंने यह भी कहा कि मनरेगा कर्मियों के संघ के प्रतिनिधियों के साथ आज हुई बातचीत में उनकी अधिकांश मांगों पर सहमति भी बन गयी थी और उनकी ओर से काम पर वापस लौटने का भी भरोसा दिलाया गया, लेकिन बाद में कुछ नेता अलग तरीके से बातचीत कर रहे है।
ग्रामीण विकास मंत्री ने बताया कि मनरेगा कर्मियों की प्रमुख चिंता है कि यदि उनके साथ कोई घटना-दुर्घटना होती है, तो उनके परिवार का क्या होगा। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार सामाजिक सुरक्षा योजना के तहत पीड़ित परिवार को हरसंभव सहायता उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।

मनरेगा कर्मियों की दूसरी मांग के संबंध में आलमगीर आलम ने बताया कि उनका कहना है कि बीडीओ-सीओ अक्सर उन्हें हटा दिये जाते है, इस संबंध में अब यह निर्णय लिया गया है कि बीडीओ-सीओ उनसे स्पष्टीकरण पूछेंगे और जवाब संतोषजनक होने पर उन्हें नहीं हटाया जाएगा, वहीं यदि उन्हें हटा दिया जाता है, तो वे प्रमंडलीय आयुक्त के समक्ष अपील भी कर सकते है।60वर्ष की उम्र सीमा पूरी होने के बाद सेवानिवृत्त होने के बाद मनरेगा कर्मियों के समक्ष आने वाली समस्या के संबंध में ग्रामीण विकास मंत्री ने बताया कि राज्य सरकार ईपीएम और अन्य सहायता के माध्यम से ऐसे रिटायर मनरेगा कर्मियों को एकमुश्त अच्छी राशि उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है, इसलिए वे चिंता छोड़ कर काम पर वापस लौट जाय।

ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम ने कहा कि कोविड-19 संक्रमणकाल में राज्य सरकार दूसरे प्रदेशों में रहने वाले लोगों को घर बुलाकर काम दे रही है,ऐसे में मनरेगा कर्मियों का भी यह दायित्व बनता है कि वे व्यवस्था को बनाये रखने में सहयोग करें।

उन्होंने कहा कि वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमणकाल में कई कठिनाईयां भी उत्पन्न हुई है, विकास का काम भी प्रभावित है, ऐसे में मनरेगा कर्मी लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने और विकास को गति देने में सहायक बने।

भाजपा के दो दशक के शासन के बावजूद मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है जनता

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उज्ज्वल दुनिया / रांची। झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सह राज्य के वित्त एवं खाद्य आपूर्ति मंत्री डॉ. रामेश्वर उरांव दो दिवसीय लोहरदगा दौरे पर है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद धीरज प्रसाद साहू के साथ लोहरदगा पहुंचे डॉ. रामेश्वर उरांव ने आज किस्को में सभी पंचायत प्रतिनिधियों और अन्य आमंत्रित प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। इस बैठक में प्रखंड के सभी पंचायत से प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था।

पुल, चेक डैम, पक्की सड़कों को लेकर आवेदन


पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता आलोक कुमार दूबे ने बताया कि इस दौरान पंचायत प्रतिनिधियों और अन्य ग्रामीणों ने अपने क्षेत्र में ट्रांसफॉर्मर, दो गांवों को जोड़ने के लिए पुल निर्माण, चेक डैम निर्माण, पक्की सड़क ,पेयजल, राशन कार्ड और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ योजनाओं को लेकर मंत्री डॉ. रामेश्वर उरांव को लिखित रूप से आवेदन सौंपा।प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने  पंचायत प्रतिनिधियों एवं ग्रामीणों की समस्याओं को गंभीरता से लिया एवं कहा कि झारखंड गठन के लगभग दो दशकों से भाजपा के नकारात्मक राजनीतिक सोंच की वजह से मूलभूत समस्याओं के लिए संघर्ष कर रही आमजनों की आकांक्षाओं के अनुरूप सरकार काम करेगी और एक विधायक के रुप में आपके उम्मीदों पर खरा उतरने का काम करूंगा।

आज अधिकारियों के साथ करेंगे बैठक


प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रामेश्वर उरांव ने बैठक में उपस्थित सभी लोगों को यह जानकारी देते हुए बताया  कि वे कल 4 सितंबर को लोहरदगा में जिले के वरीय पदाधिकारियों उपायुक्त, डीडीसी,अनुमंडल पदाधिकारी, इंजीनियर सहित सभी वरीष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर उनकी समस्याओं को लेकर जिला प्रशासन को त्वरित कार्रवाई करने का निर्देश देंगे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार सभी समस्याओं का निर्धारित समय फर काम पूरा करेगी।

आदिवासियों के विकास के लिए मिशन मोड में काम कर रहा है मंत्रालय

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उज्ज्वल दुनिया /नयी दिल्ली/रांची,3 सितंबर। केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा है कि जनजातीय मामलों का मंत्रालय टीआरआई को अनुदान के तहत अनुसंधान के लिए 26 जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) को वित्तपोषित कर रहा है और देश भर में फैले प्रतिष्ठित सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के सहयोग से गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान में लगा हुआ है । अर्जुन मुंडा वेबिनार के माध्यम से  जनजातीय मामलों के लिए एक्सीलेंस सेंटर(सीओई) द्वारा आयोजित राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे।

अर्जुन मुंडा ने कहा कि आदिवासियों की प्रगति की दिशा में पथ निर्माण के लिए हमें तकनीक का उपयोग करना होगा।   उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारी आदिवासी विकास योजनाएं बहुत गतिशील हैं। हम अतीत में कई बाधाओं से गुजरे हैं, लेकिन अब नई तकनीक की मदद से हम आगे बढ़ रहे हैं। आदिवासियों के लिए विकास योजना पर कैसे आगे बढ़ना है, यह अनुसंधान आधारित होना चाहिए। लाभार्थियों का आकलन सबसे महत्वपूर्ण पहलू है और सभी लाभ उन तक पहुंचना चाहिए । 

उन्होंने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि नीति के लिए अनुसंधान और जनजातीय प्रशासन की संवैधानिक अवधारणा के बीच बेमेल है । हम विकास योजनाओं को ध्यान में रखते हुए आदिवासी शोध नहीं कर सके। हम नीति में अनुसंधान के हस्तक्षेप से चूक गए हैं।  उन्होंने सुझाव दिया कि प्रस्तावित राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान (एनआईटीआर) में भी छात्रों को आदिवासी विकास के प्रति शिक्षित करने के लिए एक शैक्षिक विंग होना चाहिए। 

कई पहाड़ियां भारत के कब्जे में, चीन हुआ बेचैन

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आज सुबह से ​​एलएसी पर भारतीय और चीनी वायुसेना की आसमान में हलचल बढ़ी –

चीन से नया मोर्चा थाकुंग चोटी से झील के किनारे-किनारे रेनचिन ला तक खुला-

अमेरिकी खुफिया एजेंसी का खुलासा-अपने चीनी कमांडर से खफा है ड्रैगन



​​नई दिल्ली (हि.स.)। कभी लद्दाख, कभी अक्साई चिन, कभी तिब्बत तो कभी डोकलाम और कभी सिक्किम। चीन अपनी विस्तारवादी नीति के चलते जमी​​नी सीमा का उल्लंघन करने से बाज नहीं आता। इसी वजह से 1962 के युद्ध के बाद पहली बार चीन के साथ टकराव चरम पर है। खासकर मई से लेकर अब तक चीन और भारत के बीच लगातार सीमा विवाद बढ़ा है। 1962 के बाद यह पहला मौका है जब भारत ने चीनियों को मात देकर पैंगोंग के दक्षिणी छोर की उन पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया है, जहां दोनों देश अब तक सैन्य तैनाती नहीं करते रहे हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसी ​ने खुलासा किया है कि ​​भारतीय सैनिकों से टकराने के बजाय पीछे हटने​ पर चीनी सेना इस इलाके के अपने कमांडर से बुरी तरह खफा है​।​ गुरुवार सुबह से ​​एलएसी के निकट ​​भारतीय और चीनी वायुसेना की आसमान में हलचल बढ़ी है। 6 चीनी फाइटर जेट्स गलवान घाटी के 40 किमी. उत्तर-पश्चिम की ओर देखे गए हैं। इसके बाद भारतीय वायुसेना भी सतर्क हो गई है और एयर डिफेन्स सिस्टम सक्रिय कर दिया गया है।  ​

भारत और चीन के बीच सीमा का विवाद करीब 6 दशक पुराना है। इसे सुलझाने के लिए भारत ने हमेशा पहल की लेकिन चीन ने कभी अपनी तरफ से ऐसा नहीं किया। दोनों देशों के बीच कई इलाकों में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) स्पष्ट न होने की वजह से चीन और भारत के बीच के घुसपैठ को लेकर विवाद होते रहे हैं। इस बार पैन्गोंग झील के दक्षिणी छोर का लगभग 70 किमी. क्षेत्र भारत और चीन के बीच नया हॉटस्पॉट बना है। यह नया मोर्चा थाकुंग चोटी से शुरू होकर झील के किनारे-किनारे रेनचिन ला तक है। भारत की सीमा में आने वाले इस पूरे इलाके में ​​रणनीतिक महत्व की तमाम ऐसी पहाड़ियां हैं जिन पर 1962 के युद्ध के बाद दोनों देश अब तक सैन्य तैनाती नहीं करते रहे हैं। 

चीन ने 29/30 अगस्त की रात भारत के साथ नया मोर्चा पैन्गोंग झील के दक्षिणी छोर पर खोला है। भारतीय इलाके की थाकुंग चोटी पर कब्ज़ा करने आये चीनी सैनिकों को खदेड़ने के बाद तनाव ज्यादा ही बढ़ा है। चीनियों ने एक बार फिर धोखेबाजी करके भारत को एहसास करा दिया कि अब इन पहाड़ियों को खाली छोड़ना ठीक नहीं है। इसलिए दोनों पक्षों की सेनाओं ने एक-दूसरे की फायरिंग रेंज में टैंक, आर्टिलरी गन, रॉकेट लॉन्चर और सर्विलांस ड्रोन के अलावा हजारों सैनिकों की तैनाती कर दी है। ​इन तीन दिनों के भीतर भारतीय सैनिकों ने 70 कि​मी. में सीमा के साथ ​लगी ​​रणनीतिक महत्व की​ कई शीर्ष पहाड़ियों पर कब्जा कर​के चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को चौंका दिया है।​ ​लगभग 15​ हजार फीट से अधिक की ​ऊंचाई पर स्थित ​इन पहाड़ियों को सिर्फ ड्रोन और अन्य निगरानी उपकरणों ​के जरिये ही देखा जा सकता है।​
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चीन अपने कमांडर से नाराज​

पैन्गोंग झील के दक्षिणी छोर पर भारतीय सेना की कार्रवाई के बाद चीन को शर्मिंदा करने वाली ​​अमेरिकी खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने जानबूझकर भारत को उकसाने के लिए पैन्गोंग झील के इस इलाके में घुसपैठ की कोशिश की। चीन अब इसलिए बौखला गया है कि उसके कमांडर ने भारतीय सैनिकों से टकराने के बजाय पीछे हटने का फैसला क्यों किया​?​ ​​अमेरिकी खुफिया विभाग का कहना है कि चीनी सेना में एक कर्नल ​रैंक वाले अधिकारी ने अपनी सेना को बीजिंग से मिले उच्च सैन्य आदेशों के खिलाफ अपनी सेना को वापस होने का आदेश दिया। ​​
अमेरिका खुफिया का मानना है कि इस बार चीनी सैनिक दोनों पक्षों के बीच युद्ध में बढ़त हासिल करने के लिए यह उकसाने वाली कार्रवाई कर रहे थे। भारतीय सैनिकों के आने के बाद स्थिति ‘हाथापाई’ होने के करीब थी लेकिन दोनों पक्षों के अधिकारियों ने वास्तविक लड़ाई शुरू होने से पहले अपनी-अपनी सेना वापस ले ली। ​​​​रिपोर्ट में कहा गया है कि गलवान घाटी में भारत ​की कड़ी कार्रवाई ​देख चुकी चीन की सेना इतनी घबरा गई थी कि 29 अगस्त की रात भारतीय सेना को देखकर चुपचाप पीछे हट गई।​ ​अमेरिका का मानना है कि जून में गलवान की घटना के बाद भारतीय सेना ने एलएसी पर अपनी चौकसी बढ़ा दी थी और भारतीय सेना चीन के उकसावे और उससे निपटने के लिए पहले से तैयार थी। रिपोर्ट में यह भी माना गया है कि एलएसी पर भारत की तैयारियों को जानते हुए भी चीनी सेना ने 29 अगस्त की रात जो किया, वह अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसी बात है। 

रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी कहते हैं कि चीन के लिए इससे अधिक अपमानजनक कुछ भी नहीं हो सकता है क्योंकि भारत अपनी विशेष फ्रंटियर फोर्स का उपयोग कर रहा है, जिसमें मुख्य रूप से तिब्बती निर्वासित हैं जो चीनी सेना की घुसपैठ को विफल कर रहे हैं। एक समय चीन ने इन्हीं तिब्बतियों को निर्वासित कर दिया लेकिन अब यही भारत के तिब्बती सैनिक अपनी वीरता से पीएलए घुसपैठियों को पीछे धकेल रहे हैं।   

लद्दाख में ‘ग्राउंड जीरो’ पर पहुंचे सेनाध्यक्ष ​नरवणे

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जनरल नरवणे को सेना के शीर्ष कमांडर्स ने ​मौजूदा ​स्थिति के बारे में दी जानकारी
दक्षिण पैंगोंग और अन्य जगहों पर हालात का जायजा लेकर दिए चौकसी बढ़ाने के निर्देश  


नई दिल्ली (हि.स.)। पैंगोंग झील के दक्षिणी तट पर भारतीय सैनिकों द्वारा ऊंचाई की कई पहाड़ियों पर कब्जा करने के बाद चीन के साथ बढ़े सैन्य तनाव के बीच नवीनतम परिचालन स्थिति की समीक्षा करने के लिए सेना प्रमुख जनरल एमएम ​नरवणे दो दिन की यात्रा पर गुरुवार को सुबह लद्दाख पहुंच गए हैं। उन्होंने दक्षिण पैंगोंग और अन्य जगहों पर हालात का जायजा लिया है। 

सेना प्रमुख मनोज मुकुंद ​नरवणे अपने दो दिन की इस यात्रा के दौरान पूर्वी लद्दाख में मौजूदा स्थिति की समीक्षा करने के साथ ही आगे के क्षेत्र का दौरा करेंगे। सेना कमांडर ने उन्हें चीन की घुसपैठ नाकाम होने के बाद के हालातों की जानकारी दी है। ​पैंगॉन्ग​ के दक्षिणी छोर पर 29/30 अगस्त की रात हुए ताजा घटनाक्रम के बाद ​से ​भारत और चीन के बीच सीमा पर विवाद बढ़ा है जिसके बाद अब सेना प्रमुख ने लद्दाख में हालात का जायजा लिया है। यहां नरवणे ने सेना के परिचालन मुद्दों और जमीनी हालात का जायजा लेने के बाद चौकसी बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। तनाव के बीच पहुंचे सेना प्रमुख की यह यात्रा एलएसी पर मौजूद जवानों का मनोबल बढ़ाने का भी काम करेगी।
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आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि सेना प्रमुख जनरल एमएम ​​नरवणे लद्दाख की ​यह ​दो दिवसीय यात्रा ​​पैंगोंग झील के दक्षिणी तट पर ​यथास्थिति बदलने के चीन के नए प्रयासों के मद्देनजर ​है​​।​​ हालांकि ​बॉर्डर पर जारी तनाव के बीच ​​दोनों देशों के कमांडर लेवल के बीच हो रही बातचीत का आज चौथा दिन है लेकिन ​क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति की व्यापक समीक्षा करने के लिए​ सेना प्रमुख का ‘ग्राउंड जीरो’ पर पहुंचना ​मायने रखता है​।​ लद्दाख क्षेत्र में परिचालन तैयारियों की समीक्षा के लिए​ पहुंचे ​​जनरल नरवणे को सेना के शीर्ष कमांडर्स ​ने मौजूदा ​स्थिति के बारे में जानकारी ​दी है​। ​इसके साथ ही सीमा पर सेना की तैनाती और​ क्षेत्र में ​युद्ध ​के लिहाज से भारतीय सेना की तैयारियों की​ समीक्षा की जाएगी​​।​​ ​​​​

पैंगॉन्ग​ के दक्षिणी छोर पर 29/30 अगस्त की रात हुए ताजा घटनाक्रम के बाद ​से ​भारतीय सेना ने ​उन महत्वपूर्ण पहाड़ी क्षेत्रों पर कब्जा कर​ने का अभियान छेड़ दिया है​ जिन पर​ 1962 के युद्ध के बाद दोनों देश अब तक सैन्य तैनाती नहीं करते रहे हैं​​। ​​​भारत की सीमा में आने वाले इस पूरे इलाके में रणनीतिक महत्व की तमाम ऐसी पहाड़ियां हैं​ जिनमें भारत पहले ही काला टॉप और हेल्मेट टॉप अपने कब्जे में ले चुका है​ और अब गोस्वामी टॉप भी भारत के कब्जे में आने की खबर है​​।​ दोनों देशों के बीच कई इलाकों में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) स्पष्ट न होने की वजह से चीन और भारत के बीच के घुसपैठ को लेकर विवाद होते रहे हैं। इस बार पैन्गोंग झील के दक्षिणी छोर का लगभग 70 किमी. क्षेत्र भारत और चीन के बीच नया हॉटस्पॉट बना है। यह नया मोर्चा थाकुंग चोटी से शुरू होकर झील के किनारे-किनारे रेनचिन ला तक है।

मानसून सत्र के दौरान सदस्य पूछ सकेंगे लिखित सवाल

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नई दिल्ली (हि.स.)। संसद के मानसून सत्र में प्रश्नकाल न कराए जाने को लेकर उठे विवाद के मद्देनजर सरकार ने बीच का रास्ता अख्तियार किया है। अब सत्र के दौरान सांसद लिखित में सवाल पूछ सकेंगे, जिसका जवाब में लिखित में ही मिलेगा। 

गुरुवार को संसद सत्र से जुड़ा एक नोटिफिकेशन जारी किया गया, जिसमें कहा गया है कि सांसदों को ये बताया जाता है कि इस बार राज्य सभा में प्रश्नकाल नहीं होगा। ऐसे में सभी सदस्य अपने सवाल पहले दे सकते हैं जिनका लिखित जवाब मिलेगा। 

इससे पूर्व, गत बुधवार को संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा था कि सरकार सदन में हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि राज्यसभा के सभापति व लोकसभा अध्यक्ष से सत्र के दौरान प्रश्नकाल की कार्यवाही आधे घण्टे के लिए शामिल करने का आग्रह किया गया है, अब फैसला उनको लेना है। सरकार की इस पहल के बाद आज यह नोटिफिकेशन जारी किया गया। यह तय किया गया कि सदस्य लिखित रूप में सवाल पूछ सकते हैं। 

उल्लेखनीय है कि कोरोना महामारी की समस्या के बीच आगामी 14 सितम्बर से संसद का मॉनसून सत्र शुरू होना है। 

फिर भारत के कब्जे में आई फिंगर

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सामरिक स्थिति मजबूत करके चीन को सेना ने दी एक और मात
 एलएसी पर भारत-चीन में तनाव बढ़ने की यहीं से हुई थी शुरुआत सुनीत निगम

नई दिल्ली, (हि.स.)। आखिरकार भारत ने लद्दाख में पैंगोंग के उत्तरी किनारे की फिंगर 4 को फिर अपने कब्जे में ले लिया है। इस तरह 4 महीने बाद यह इलाका भारतीय सेना के कब्जे में पूरी तरह से आ गया है। अब यहां से सबसे निकट चीन की पोस्ट फिंगर 4 के पूर्वी हिस्से में हैं, जो भारतीय सेना की चौकी से कुछ मीटर की दूरी पर है। पैन्गोंग झील के उत्तरी किनारे पर विवाद की मुख्य जड़ फिंगर-4 की रिजलाइन पर भी भारतीय सेना ने चीनी प्रयासों को विफल करते हुए बेहतर सामरिक स्थिति बना ली है।  

पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर चीनी सैनिकों ने मई के शुरुआती दिनों में भारतीय क्षेत्र में आने वाली फिंगर-4 से 8 तक पूरे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था। मौजूदा तनाव से पहले चीन का फिंगर-8 में एक स्थायी कैम्प था और भारत मई से पहले फिंगर-8 तक पेट्रोलिंग करता था। इसे ऐसे समझना आसान होगा कि फिंगर-4 और फिंगर-8 के बीच आठ किमी. की दूरी है। इस तरह देखा जाए तो चीन ने आठ किलोमीटर आगे बढ़कर फिंगर-4 पर कब्जा करके पैंगोंग झील के किनारे आधार शिविर, पिलबॉक्स, बंकर और अन्य बुनियादी ढांंचों का निर्माण कर लिया। इतना ही नहीं यहां पर चीन ने आर्टिलरी और टैंक रेजिमेंट्स को तैनात कर दिया। इसके बाद चीन के सैनिक भारतीय गश्ती दल को फिंगर-4 से आगे नहीं जाने देते थे। पूर्वी लद्दाख में पैगोंग झील इलाके में एलएसी पर दोनों पक्षों में तनाव बढ़ने की शुरुआत यहीं से हुई थी।  

इस बीच भारत और चीन के सैन्य कमांडर स्तर की हुई वार्ताओं में चीन से वापस फिंगर-8 पर जाकर अप्रैल, 2020 से पहले की स्थिति बहाल करने के लिये सख्ती के साथ कहा गया। इन्हीं वार्ताओं में फिंगर एरिया में 4 किमी. का बफर जोन बनाने की बात तय हुई। लगातार सैन्य और कूटनीतिक वार्ताओं में दबाव बनाने का नतीजा यह रहा कि चीनी सैनिक अचानक 9 जुलाई को फिंगर-4 पर कब्जा जमाए बैठे चीनी सैनिक 2 किमी. पीछे खिसककर फिंगर-5 पर चले गए। पीएलए ने फिंगर 5 के पास पहले से ही 6 बंकरों का निर्माण कर रखा है। दोनों सेनाओं के बीच 4 किमी. का बफर जोन बनाने के लिये भारतीय सेना को अपना ही क्षेत्र खाली करके फिंगर-3 पर आना पड़ा। चीनियों को पीछे खदेड़ने के चक्कर मेंं भारतीय सैनिक फिंगर-3 तक ही सीमित रह गए, जहां भारत का पहले से ही आधार कैम्प था। 

अब बदली परिस्थितियों में आक्रामक हुई भारतीय सेना ने अपनी सामरिक स्थिति को मजबूत करने के लिए फिर से फिंगर 4 पर काबिज होकर चीनियों को मात दी है। रणनीतिक लिहाज से फिंगर-4 चोटी चारों ओर से ऊंचाइयों पर हैं, जहां से काफी दूर तक चीन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है क्योंकि भारतीय सेना का प्रशासनिक शिविर तलहटी पर है। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने फिंगर-4 पहाड़ी की ऊंचाई का महत्व बताते हुए कहा कि पहाड़ों पर युद्ध के दौरान दुश्मन को जवाब देने के लिहाज से ऊंचाई महत्वपूर्ण होती है। चीनी अब तक एक हाथ ऊपर था, क्योंकि वे उच्च ऊंचाई पर बैठे थे। अब हम उन जगहों पर उनके आसपास हैं, जहां वे नहीं थे।

मगर हिल और गुरुंग हिल पर भी भारतीय सैनिकों का कब्जा

  इसी के मद्देनजर भारत ने पिछले 4 दिनों में पैंगोंग झील के दक्षिणी छोर के लगभग 25 किलोमीटर के इलाके में पेट्रोलिंग प्वाइंट 27 से 31 के बीच स्पांगुर गैप के पास मगर हिल और गुरुंग हिल पर भी भारतीय सैनिकों ने कब्जा कर वहां तैनाती कर ली है। भारतीय सैनिकों ने अब जिन पहाड़ियों पर मोर्चा जमाया है, वहां से चीन के मोल्डो सैनिक मुख्यालय तक नजर रखी जा सकती है। यह पहाड़ियां चुशूल के इलाके में बेहद रणनीतिक महत्व की हैं। स्पांगुर गैप भारत और चीन के बीच लगभग 50 मीटर चौड़ा रास्ता है, जिसके एक ओर मगर हिल और दूसरी ओर गुरुंग हिल है। भारतीय सैनिकों ने उन रिंचिंग ला और रेजांग ला पर कब्जा किया है, जहां 1962 में भीषण लड़ाई हुई थी। इस समय पैंगोंग के दक्षिण किनारे से लेकर रेजांग ला तक हर पहाड़ी पर भारतीय सैनिकों का कब्जा है। हालात बेहद तनावपूर्ण हैं और एलएसी पर भारत की बढ़त से खिसियाए चीन की तरफ से कोई नया मोर्चा खुलने की आशंका है।

मुख्यमंत्री का बयान संघीय ढांचे पर हमला: दीपक प्रकाश

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भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष व राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश ने मुख्यमंत्री के बयान पर जोरदार हमला करते हुए निंदा की है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री का बयान भीम राव अम्बेडकर द्वारा बनाये गए संविधान का अपमान किया है। संघीय ढांचा के ऊपर कुठारघात किया है। संविधान की शपथ लेकर भारत की एकात्मता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करने का काम मुख्यमंत्री ने किया है। मालूम हो कि मुख्यमंत्री ने कहा था कि झारखंड के पैसे से अपनी जेब भर रहा है केंद्र। मामले में प्रदेश अध्यक्ष व सांसद दीपक प्रकाश ने इस ब्यान को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा कि केंद्र और राज्य दोनों के अपने अपने कर्तव्य है और अधिकार भी है। दोनों एक दूसरे के पुरक हैं। भारत की एकात्मता के कारण ही भारत की पहचान है। इस प्रकार का बयान देकर माननीय मुख्यमंत्री ने ओछी मानसिकता का परिचय दिया है। 

अपनी असफलता से आम जनता को भटकाने का है प्रयास।


मुख्यमंत्री के बयान का खंडन करते हुए कहा कि एक राज्य से देश नहीं चलता है। देश के सभी राज्य एक दूसरे के पूरक हैं। कहीं चावल होता है कहीं गेहूं होता है कहीं कोयला पाया जाता है। प्रत्येक राज्य की अपनी अपनी पहचान व योगदान है, यही भारत की ताकत है। मुख्यमंत्री महोदय अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए केंद्र सरकार पर दोष गढ़ रहे है। जब से सरकार बनी है विकास का एक भी कार्य नहीं हुआ है। केंद्र सरकार द्वारा भेजे गए अनाज सरकार जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचा पा रही है। आज किसी भी अस्पताल में उचित व्यवस्था नहीं है, निजी अस्पतालों में लूट मची है। राज सरकार के पास इच्छाशक्ति की कमी स्पष्ट दिखाई दे रही है। 

खनिज संपदा की तस्करी से हो रहा है राजस्व का नुकसान।


सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि राज्य में खनिज संपदा की चोरी हो रही है, खनिज संपदा की तस्करी के कारण राज्य के राजस्व में कमी आ रही है। इसे रोकने में सरकार नाकाम हो रही है। खुद सत्ताधारी दल के विधायक आरोप लगा रहे हैं की खनिज संपदा की चोरी हो रही है। सरकार पहले अपने चेहरे को आईने में देखे, सरकार अपनी विफलताओं को केंद्र सरकार के मत्थे फोड़ने के बजाय विकास कार्य में लगे तो राज्य और जनता के लिए बेहतर होगा।

कांग्रेस के रहते विभाजनकारी ताकतें सफल नहीं हो सकतीं

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उज्ज्वल दुनिया /रांची। झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर उरांव ने कहा है कि पार्टी ने अपने स्थापना काल के कुछ ही वर्षा बाद 1905 में सरकार की फूट डालो-राज करो की नीति और कट्टरपंथियों के नापाक इरादे के खिलाफ संघर्ष किया था और एक फिर से ऐसी ही दमनकारियों और लोगों को बरगलाने वाली शक्तियों के खिलाफ एकजुट होने की जरुरत है। डॉ. उरांव आज राष्ट्र निर्माण की अपनी महान विरासत पर कांग्रेस की श्रृंखला ‘धरोहर’ की छठी कड़ी के सोशल मीडिया पर जारी पोस्ट को शेयर करने के मौके पर मीडियाकर्मियों से बातचीत कर रहे थे। 

उन्होंने बताया कि 7 अगस्त 1905 को कोलकाता के टाउन हॉल में एक बैठक के दौरान ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया गया और बनारस अधिवेशन में गोपाल कृष्ण गोखले के नेतृत्व में स्वदेशी आंदोलन की औपचारिक घोषण की गयी। यह एक आर्थिक आंदोलन भी था, जिसका उद्देश्य अपने देश के कारीगरों और निर्माताओं को आर्थिक तथा सामाजिक रूप से मजबूत करना था। यही आंदोलन देश में कई स्थानीय कपड़ा कंपनी बैंकों, बीमा कंपनियों आदि की स्थापना की नींव बना। लाला लालपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपीन चंद्र पाल जैसे नेताओं के सानिध्य में इन आंदोलनों ने भारतीयों को एकजुट किया और आगे चलकर सत्याग्रह एवं असहयोग आंदोलन की नींव के रूप में कार्य किया। दादा भाई नौरोजी के नेतृत्व में कोलकाता में 1906 के कांग्रेस अधिवेशन ने राष्ट्रीय शिक्षा और स्वशासन संकल्पों के जरिये आंदोलन को और गति देने और इसी अधिवेशन में पहली बार स्वराज पर बल देते हुए दादा भाई नोरोजी ने कहा कि हम कोई कृपा की याचना नहीं कर रहे है, हमें तो केवल न्याय चाहिए। स्वदेशी से लेकर स्वराज्य तक कांग्रेस ने आजादी के बाद भी अपने विचारों से समझौता नहीं किया और कई संस्थानो का निर्माण कर देश को आत्मनिर्भर बनाया। उन्होंने कहा कि देश के लिए ये सोच ये संघर्ष आज भी जारी है और आगे भी जारी रहेगा। 

पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता आलोक कुमार दूबे, लाल किशोरनाथ शाहदेव और राजेश गुप्ता छोटू ने  ‘धरोहर’ नामक वीडियो की छठी कड़ी को शेयर करते हुए कहा कि नयी युवा पीढ़ी को कांग्रेस पार्टी के इतिहास और कार्यां से अवगत कराने के लिए इस कार्यक्रम की शुरुआत की गयी है। उन्होंने बताया कि पार्टी के तमाम मंत्रियों, विधायकों, सांसदों और वरिष्ठ नेताओं ने भी वीडियो को शेयर किया।प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रभारी आरपीएनसिंह के निर्देशन में  राज्य के सभी पदाधिकरियों ने इस महत्वपूर्ण वीडियो को सोशल मीडिया के माध्यम से आमजनों तक पहुंचाने का काम किया गया ताकि युवा पीढ़ी को हमारे कार्यों की जानकारी मिल सके।

भूखल घासी की भूख से मौत के बाद भी सरकार से नहीं मिली मदद

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उज्ज्वल दुनिया /रांची ।  बीते 7 मार्च को झारखंड के बोकारो जिले में भूखल घासी (42 वर्ष) की मौत भूख से हो गयी थी। बताया गया कि भूखल घासी के घर में चार दिनों से चूल्हा नहीं जला था। जिसके बाद इस मामले को मेरे द्वारा नई सरकार के पहले विधान सभा सत्र मे प्रमुखता से उठाया गया। इस दौरान मौन प्रदर्शन, प्रदर्शन, विधान सभा का बहिष्कार तक किया गया। लेकिन राज्य सरकार के कानों पर जूं तक नही रेंगी। मैंने विधान सभा मे इस मामले में गंभीरता से उठाते हुए उच्च स्तरीय जांच और भुलहल घासी के परिजनों को राहत राशि देने की मांग की थी। लेकिन यह सरकार सिर्फ जुमलों पर चलने वाली सरकार है। आज तक किसी भी मांग को गंभीरता के साथ पूरा नही किया गया। जिसका नतीजा यह हुआ कि पिछले छः महीने में भूखल घासी के तीन परिजन की मौत हो गयी और आज उसके बेटी की भी मौत हो गयी। उक्त बातें चंदनकियारी विधायक सह पूर्व मंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष अमर कुमार बाउरी ने कही। 

नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दें सीएम- बाउरी 


भूखल घासी के बेटी की मौत के बाद अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अमर कुमार बाउरी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की बात भी कही। उन्होंने कहा कि राज्य के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मंदिर में भी भूखल घासी की मौत का मामला आने के बाद भी सरकार के तर्फवसे कोई गंभीरता नही दिखाई गई। यह राज्य के लिए शर्म की बात है। उन्होंने सरकार के मुख्यमंत्री, मंत्री एवं अधिकारियों से पूछा कि क्या यह सरकार राज्य में दलित, आदिवासियों को जीने का हक और अधिकार छीनना चाहती है।

दबंगो ने जला दिया था भूखल का शव


बता दें कि भूखल घासी की मौत की खबर 6 मार्च 2020 की शाम को ही कसमार प्रखंड के बीडीओ राजेश कुमार सिन्हा को दी गई थी, लेकिन तीन चार घंटा बीत जाने के बाद भी कोई भी अधिकारी या कर्मी घटनास्थल पर नहीं पहुंचा था। दूसरी तरफ क्षेत्र के ही कुछ दबंग लोगों के दबाव में भूखल घासी के शव को जला दिया गया। बहाना यह बनाया गया कि स्थानीय श्मशान घाट नदी और जंगल किनारे है, इसलिए जंगली जानवरों के भय से शव को जलाना पड़ा। ऐसी हरकत से शव का पोस्टमार्टम नहीं हो पाया।

झारखंड विधानसभा का मानसून सत्र 18 से 22 तक

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उज्ज्वल दुनिया / रांची: झारखंड विधानसभा का मॉनसून सत्र आहूत करने को लेकर प्रशासनिक तैयारियां शुरू हो गयी है। संवैधानिक बाध्यता और प्रावधान के मुताबिक तेईस सितंबर के पहले विधानसभा सत्र बुलाना जरूरी है। इसे लेकर संसदीय कार्यमंत्री आलमगीर आलम ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से बात की है।

संसदीय कार्यमंत्री ने बुधवार को पत्रकारों को विधानसभा सत्र आहूत करने को लेकर राज्य मंत्रिमंडल और मुख्यमंत्री से स्वीकृति मिलने के बाद प्रस्ताव को सहमति लिए राज्यपाल के पास भेजा जाएगा। राज्यपाल से स्वीकृति मिलने पर सत्र आहूत होगा।

आलम ने बताया कि संसदीय कार्य विभाग की ओर से 18 से 22 सितंबर तक सत्र आहूत करने का प्रस्ताव तैयार किया है, जिसके तहत तीन कार्य दिवस 18, 21 और 22 सितंबर को बैठक बुलायी जा सकती है, जबकि 19 और 20 सितंबर को शनिवार तथा रविववार रहने के कारण अवकाश होगा।

गौरतलब है कि झारखंड विधानसभा का बजट सत्र चल ही रहा था, इस बीच लॉकडाउन लागू हो जाने के कारण झारखंड विधानसभा का बजट सत्र अपने निर्धारित समय से चार कार्य दिवस पहले ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था।

वहीं अब संवैधानिक बाध्यता के कारण 23 सितंबर के पहले विधानसभा का सत्र आहूत करना है, इसे लेकर विधानसभा सचिवालय द्वारा भी में प्रशासनिक तैयारियां शुरू कर दी गयी है।

बताया गया है कि जिस तरह से संसद सत्र के दौरान सोशल डिस्टेसिंग के साथ सांसदों के बैठने का इंतजाम किया गया है, उसी तरह की तैयारी यहां भी की जा रही है।