Friday 26th of June 2026 07:37:44 AM
Home Blog

झारखंड राज्य विधिक परिषद के लिए मतदान और बालू घाटों की नीति

0

मतदान का विवरण

झारखंड राज्य विधिक परिषद के लिए मतदान की प्रक्रिया सभी नागरिकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह चुनाव न केवल विधिक परिषद की संरचना को प्रभावित करता है, बल्कि यह राज्य की विधिक नीतियों और प्रक्रियाओं पर भी गहरा प्रभाव डालता है। मतदान का कार्यक्रम आम तौर पर पहले से निर्धारित होता है, और इसे चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचित किया जाता है।

मतदान के लिए निर्धारित स्थलों की जानकारी आमतौर पर सरकारी वेबसाइटों और स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी की जाती है। मतदाता अपने निकटतम मतदान केंद्र पर जाकर अपनी पहचान बताने के बाद मतदान कर सकते हैं। हर मतदाता को यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि वह मतदान की तिथि और समय का ध्यान रखे, क्योंकि निर्धारित समय के बाद मतदान प्रक्रिया समाप्त हो जाती है।

इस चुनाव में भाग लेने वाले मतदाताओं की संख्या आमतौर पर उच्च होती है, जो दर्शाती है कि लोग अपने विधायी अधिकारों के प्रति सजग हैं। मतदान का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी सामाजिक वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व किया जा सके। इस संदर्भ में, हर मतदाता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि एक वोट एक विचार को प्रदर्शित करता है।

इस प्रक्रिया में सभी मतदाताओं को अपनी पसंद के प्रतिनिधि को चुनने का अवसर मिलता है, जो भविष्य में उनके जीवन पर प्रभाव डाल सकता है। समझदारी से मतदान करना न केवल लोकतंत्र का स्वरूप है, बल्कि यह एक नागरिक की जिम्मेदारी भी है। अंततः, झारखंड राज्य विधिक परिषद का चुनाव एक ऐसी प्रक्रिया है, जो स्थानीय शासन को प्रभावित करती है और इसके प्रभाव राज्य के दायरे में फैले होते हैं।

मतदाता की भूमिका और अधिकार

मतदाता की भूमिका लोकतांत्रिक प्रणाली में अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से अपने अधिकारों का उपयोग करते हैं। झारखंड राज्य विधिक परिषद के चुनाव में मतदाता न केवल अपने मताधिकार को प्रयोग में लाते हैं, बल्कि वे उन मुद्दों को भी प्रभावित करते हैं जो समाज पर प्रत्यक्ष रूप से असर डालते हैं। मतदाता को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे अपने अधिकारों के प्रति सजग रहें और चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने के लिए सक्रिय रूप से प्रेरित हों।

मतदाता के अधिकारों में मुख्यतः यह शामिल है कि वे स्वतंत्रता से अपने मत का प्रयोग कर सकें, बिना किसी दबाव या भय के। इसके अतिरिक्त, हर मतदाता को यह अधिकार भी प्राप्त है कि वे चुनावों के संबंध में जानकारी प्राप्त करें, उम्मीदवारों के बारे में जानें और उस आधार पर अपने निर्णय लें। झारखंड राज्य विधिक परिषद जैसे चुनावों में, जहां विधायी और कानूनी मुद्दे महत्वपूर्ण होते हैं, मतदाताओं का सक्रिय हिस्सा बनना आवश्यक है।

अपने मताधिकार का प्रभावी ढंग से प्रयोग करना अनुशासन, जागरूकता और जिम्मेदारी की मांग करता है। इसके लिए मतदाताओं को नियमित रूप से उन मुद्दों पर चर्चा करने और विचार करने की आवश्यकता है जो समाज को प्रभावित करते हैं। जब आम लोग समझते हैं कि मतदान का उनके जीवन पर क्या असर पड़ता है, तो वे अधिक प्रभावी ढंग से मतदान कर सकते हैं। झारखंड राज्य विधिक परिषद के चुनाव में भाग लेने से न केवल व्यक्तिगत अधिकारों का संरक्षण होता है, बल्कि इससे क्षेत्रीय मुद्दों पर ध्यान देने और सुधार के लिए भी रास्ता तैयार होता है।

विधिक परिषद का महत्व

विधिक परिषद राज्य की न्यायिक प्रणाली का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो न्याय के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कानून के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह परिषद न केवल कानूनी सलाह और समर्थन प्रदान करती है, बल्कि यह सुनिश्चित करती है कि स्थानीय समुदायों के विधिक अधिकारों का संरक्षण किया जाए। इसके द्वारा नागरिकों के बीच न्याय के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ समाज में विधिक ज्ञान का प्रसार भी किया जाता है।

विधिक परिषद का कार्यक्षेत्र अधिकतर न्यायिक मामलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह विधि सुधार, कानूनों की व्याख्या और नागरिकों को उनकी कानूनी जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक करने में भी सक्रिय रहता है। परिषद के माध्यम से, राज्य की न्यायिक प्रक्रियाओं को सरल और सुलभ बनाना, और नागरिकों को उनके अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी सहायता प्रदान करना संभव होता है। इस प्रकार की सक्रियता से न केवल न्याय प्राप्य होता है, बल्कि यह पूरे समाज में सामाजिक संतुलन और व्यवस्था को बनाए रखता है।

यह परिषद न्यायिक प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देती है। इसके सदस्य विशेषज्ञ होते हैं जो विभिन्न कानूनी पहलुओं का गहराई से अध्ययन करते हैं और मार्गदर्शन प्रदान करने में सक्षम होते हैं। इसके अलावा, विधिक परिषद राज्य के नीति निर्माताओं को कानूनी दृष्टिकोण से सलाह देती है, जिससे न केवल विधिक अधिकारों का संरक्षण होता है, बल्कि प्रभावी नीतियों और कानूनों का निर्माण भी किया जा सकता है। इस संदर्भ में, विधिक परिषद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह समाज की नींव को मजबूत बनाने में योगदान करती है।

तनाव रहित मतदान का वातावरण

झारखंड राज्य विधिक परिषद के लिए मतदान के दौरान एक तनाव रहित वातावरण सुनिश्चित करना एक महत्वपूर्ण पहलू है। चुनावी प्रक्रिया में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए राज्य प्रशासन ने कई कदम उठाए हैं। इन उपायों का उद्देश्य मतदाताओं को एक सुरक्षित और संरक्षित माहौल प्रदान करना है, जिससे वे बिना किसी भय या दबाव के अपने मत का उपयोग कर सकें।

चुनाव के समय, प्रशासन ने सुरक्षा बलों की तैनाती की, विशेष रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में. इन बलों ने न केवल मतदान केंद्रों पर सुरक्षा सुनिश्चित की, बल्कि मतदाताओं का विश्वास भी बढ़ाया। प्रशासन द्वारा आयोजित संवाद और बैठकें, जहां स्थानीय समुदाय के सदस्यों को शामिल किया गया, इन चुनावों को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने में सहायक सिद्ध हुईं।

प्रशासन ने चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बना दिया है। मतदान केंद्रों पर वीडियो निगरानी स्थापित की गई, जिससे चुनाव के दौरान किसी भी तरह की अनियमितता को रोका जा सके। इसके अलावा, मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से जनता को सूचित किया गया कि कैसे वे अपनी आवाज उठा सकते हैं और स्वतंत्र रूप से मतदान कर सकते हैं। इस तरह की पहल ने लोगों के बीच विश्वास का भाव जगाया और मतदान प्रति रुचि बढ़ाई।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का वातावरण मतदाता सहभागिता को बढ़ावा देने में सहायक होता है। जब लोग यह महसूस करते हैं कि उनके मतदान की प्रक्रिया सुरक्षित है और कोई बाहरी दबाव नहीं है, तो वे अधिक उत्साह से मतदान में भाग लेते हैं। इस प्रकार, झारखंड में प्रशासनिक प्रयासों ने न केवल एक तनाव रहित मतदान का वातावरण तैयार किया बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मजबूती में भी योगदान दिया है।

बालू घाटों की नीतियों पर चर्चा

झारखंड सरकार ने बालू घाटों के ठेकों को लेकर सुनियोजित नीतियाँ विकसित की हैं, जिनका उद्देश्य बालू की अवैध खनन गतिविधियों पर रोक लगाना और इस क्षेत्र में पारदर्शिता लाना है। बालू घाटों का संचालन राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इस क्षेत्र में बालू माफियाओं की सक्रियता ने कई समस्याओं को जन्म दिया है। इसके समाधान के लिए सरकार ने एक प्रभावी नीति निर्धारित की है।

इस नीति के अंतर्गत बालू खनन के लिए लाइसेंस हासिल करने के लिए सख्त नियम और प्रक्रियाएँ लागू की गई हैं। यह सुनिश्चित किया गया है कि केवल वे कंपनियाँ या व्यक्ति जिनके पास उचित दस्तावेज़ और संसाधन हैं, वे ही बालू घाटों का ठेका ले सकें। इसके साथ ही हर ठेकेदार को अनिवार्य रूप से नक्शा और पर्यावरण अनुमति के साथ आवेदन करना होगा, ताकि वैधता और पारिस्थितिकी का ध्यान रखा जा सके।

सरकार ने बालू माफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का निर्णय लिया है। अवैध खनन गतिविधियों में संलग्न व्यक्तियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए विशेष निगरानी टीमों का गठन किया गया है, जो बालू घाटों की नियमित जाँच कर रही हैं। इस पहल का उद्देश्य बालू की आपूर्ति को सुनिश्चित करते हुए व्यक्तियों की सुरक्षा को भी ध्यान में रखना है। इस प्रकार, झारखंड सरकार ने बालू घाटों के ठेकों का प्रबंधन करने के लिए एक सतत और समग्र दृष्टिकोण अपनाया है, जिससे दीर्घकालिक विकास की संभावनाएँ बढ़ेंगी।

स्थिति में बदलाव और सरकार की सक्रियता

झारखंड राज्य में बालू घाटों की नीति में हालिया बदलावों के चलते सरकार ने बालू निकालने की प्रक्रिया को अधिक संगठित और प्रभावी बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इन कदमों में से एक प्रमुख कार्यवाही है ब्लैक लिस्टिंग प्रक्रिया, जिसके माध्यम से उन कंपनियों और व्यक्तियों को चिन्हित किया जा रहा है जो नियमों का पालन नहीं करते हैं। इस प्रक्रिया के माध्यम से अवैध बालू खनन को रोकने और पारदर्शिता को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है।

सरकार ने बालू घाटों के संचालन को नियंत्रित करने के लिए नियमों में उचित संशोधन किए हैं। यह आवश्यक है कि सभी निष्कर्षण गतिविधियों के लिए आवश्यक अनुमति प्राप्त की जाए, और अवैध तरीके से बालू निकालने वाले ठेकेदारों को कड़ी सजा दी जाए। इसके अलावा, सरकार ने इन घाटों की रक्षात्मक यानी संरक्षण की नीति को भी पुनर्व्यवस्थित किया है। इससे यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि बालू का निष्कर्षण पर्यावरण के लिए हानिकारक न हो।

सरकार की सक्रियता में न केवल अवैध खनन पर अंकुश लगाना शामिल है, बल्कि इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखना भी एक प्राथमिकता है। बालू घाटों की निगरानी के लिए तकनीकी उपायों का उपयोग किया जा रहा है, जिसमें उपग्रह इमेजिंग सहित आधुनिक निगरानी प्रणाली शामिल हैं। यह सुनिश्चित करता है कि सभी गतिविधियों की नियमित जांच की जा सके और किसी भी प्रकार के अनियमितताओं का त्वरित समाधान किया जा सके। अंततः, इन प्रयासों से सरकार का उद्देश्य अवैध बालू खनन को नियंत्रित करना तथा सभी संबंधित हितधारकों के लिए संवर्धित पारदर्शिता और जिम्मेदारी लाना है।

कंपनियों पर कार्रवाई का प्रभाव

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू कंपनियों का संचालन और उनके खिलाफ की जाने वाली कार्रवाई है। जब कंपनियाँ विभिन्न कारणों से शासन या कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करती हैं, तो सरकार या संबंधित प्राधिकरण उनकी गतिविधियों पर कार्रवाई करने के लिए बाध्य होती है। इस कार्रवाई का प्रभाव सीधे तौर पर समाज और आर्थिक संरचना पर पड़ता है। यदि कोई कंपनी अपने पर्यावरण संरक्षण या श्रम कानूनों का उल्लंघन करती है, तो उसे भारी जुर्माना या दंड का सामना करना पड़ सकता है।

इसके परिणामस्वरूप, कंपनियों को अपने संचालन में अधिक जिम्मेदार और पारदर्शी बनने के लिए प्रेरित किया जाता है। यह न केवल समाज के लिए लाभदायक है, बल्कि यह आर्थिक स्थिरता को भी बढ़ावा देता है। इसके साथ ही, कंपनियाँ जब सामाजिक और कानूनी दायित्वों का पालन करती हैं, तो उनका ब्रांड मूल्य उभरता है, जो दीर्घकाल में उनके लिए लाभकारी साबित होता है।

न केवल वर्तमान, बल्कि भविष्य में भी ऐसी कार्रवाइयों का गहरा प्रभाव पड़ सकता है। यदि कंपनियाँ अपनी नीतियों को संवर्धित करती हैं और अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति सचेत रहती हैं, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव अर्थव्यवस्था में स्थायित्व और विकास के रूप में देखा जा सकता है। इसके अलावा, सक्षम और पारदर्शी सरकार न केवल एक स्वस्थ व्यापार माहौल बनाती है, बल्कि निवेशकों का विश्वास भी बढ़ाती है।

उदाहरण के लिए, जब कंपनियाँ अपने उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार लाती हैं या पर्यावरणीय मानकों का पालन करती हैं, तो यह न केवल उन्हें प्रतिस्पर्धात्मक लाभ देता है बल्कि पूरे उद्योग में सकारात्मक बदलाव को भी प्रेरित करता है। इस प्रकार, कंपनियों पर कार्रवाई का प्रभाव विभिन्न स्तरों पर पड़ता है, जो समाज और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

झारखंड राज्य विधिक परिषद के लिए मतदान और बालू घाटों की नीति में स्थानीय समुदाय का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। स्थानीय निवासियों का मानना है कि यह नीतियाँ उनकी आजीविका पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती हैं। बालू घाटों की नीतियों के तहत, जब सरकारी योजनाएँ लागू होती हैं, तो यह आवश्यक है कि स्थानीय समुदाय को इसके पीछे की प्रक्रिया में शामिल किया जाए। विशेष रूप से, जब बालू खनन की बात आती है, तो यह समुदाय के लिए एक आमदनी का स्रोत हो सकता है, लेकिन सरकारी नीतियों के अभाव में यह समुदाय हानि भी उठा सकता है।

एक ओर, कुछ समुदाय के सदस्य सरकारी प्रयासों को सकारात्मक मानते हैं, क्योंकि इससे उन्हें नए नियमों के तहत कई आर्थिक और सामाजिक उपलब्धियाँ हासिल करने की उम्मीद है। वे मानते हैं कि नए कानून और उनके कार्यान्वयन से स्थानीय स्तर पर स्थिरता बनी रहेगी और अनुप्रवेश की प्रक्रियाएँ अधिक पारदर्शी होंगी। स्थानीय नेताओं के साथ बैठकें और संवाद इस प्रक्रिया में भरोसा बढ़ाने में मददगार साबित हो रहे हैं।

हालांकि, दूसरी ओर, अनेक स्थानीय लोग इस बात पर भी चिंता जताते हैं कि यदि नीतियों का कार्यान्वयन उचित तरीके से नहीं किया गया, तो यह उनकी जमीनों और जलस्रोतों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। ऐसे में, उन पर उत्पीड़न का खतरा बनता है, तथा वे अपनी आर्थिक स्थिति से वंचित हो सकते हैं। यह आम जनता के लिए एक बड़ा चुनौती बनता है, जिससे स्थानीय समुदायों में असंतोष और असुरक्षा का माहौल उत्पन्न होता है। इसलिए, इन नीतियों को लागू करने में यह अनिवार्य हो जाता है कि स्थानीय दृष्टिकोण को ध्यान में रखा जाए।

भविष्य की योजनाएँ और सुझाव

झारखंड राज्य विधिक परिषद में मतदान प्रक्रिया और बालू घाटों की नीति का भविष्य सुनिश्चित करने के लिए कुछ सुझाव और योजनाएँ प्रस्तुत की जा सकती हैं। सबसे पहले, सरकार को मतदान प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सुलभ बनाने के लिए तकनीकी उपायों को अपनाना चाहिए। इस दिशा में, इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली की स्थापना से न केवल प्रक्रिया में तेजी आएगी, बल्कि मतदान का प्रतिशत भी बढ़ेगा। विशेषकर युवाओं और महिलाओं को इसके प्रति जागरूक करना आवश्यक है।

इसके अलावा, बालू घाटों की नीति को सुदृढ़ करने के लिए, प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन की उचित नीति बनानी चाहिए। यह आवश्यक है कि सरकार पत्थर खनन और बालू निकासी के लिए एक ठोस लाइसेंसिंग प्रणाली स्थापित करे, जिसमें पर्यावरणीय नीतियों का पालन और स्थानीय समुदायों के हितों का ध्यान रखा जाए। इससे निष्कर्षण गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ेगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

अंततः, नागरिकों की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए, सरकार को सार्वजनिक संवाद और कार्यशालाओं का आयोजन करना चाहिए। जिससे नागरिकों को बालू घाटों की चुनौतियों और मतदान प्रक्रिया के महत्व पर जागरूक किया जा सके। लोगों का सक्रिय रूप से शामिल होना सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक अभियानों का आयोजन करना भी आवश्यक है। इन सुझावों का पालन करने से झारखंड में मतदान प्रक्रिया और बालू घाटों की नीति, दोनों को प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी।

SCO शिखर सम्मेलन में शहबाज़ शरीफ का अजीब व्यवहार; मोदी-पुतिन को देखकर दौड़े, ऑनलाइन ट्रोल हुए

0

तियांजिन: 25वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ को वीडियो में अजीब पलों के लिए ट्रोल किया गया, जिसमें वह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द दिखाई दिए।

एक वीडियो में शरीफ पास खड़े हैं, जब पीएम मोदी और पुतिन साथ चलते हुए बातचीत में व्यस्त हैं। इस दौरान शरीफ को देखा जा सकता है कि वह देख रहे हैं जबकि दोनों नेता बिना किसी प्रतिक्रिया के गुजर जाते हैं। यह क्षण तुरंत इंटरनेट पर वायरल हो गया।

एक अन्य वीडियो ने ट्रोलिंग को और बढ़ा दिया। आधिकारिक फोटो सत्र के बाद, शरीफ पुतिन की ओर दौड़ते हुए हाथ बढ़ाते हैं। इस जल्दबाजी को ऑनलाइन आलोचना का निशाना बनाया गया और इसे ‘ध्यान आकर्षित करने वाला व्यवहार’ बताया गया।

वायरल क्लिप में, पुतिन शी जिनपिंग के साथ चलते हैं और शहबाज़ शरीफ पीछे से आए और अचानक हाथ बढ़ाते हैं।

इस बीच, पीएम मोदी और पुतिन को बाद में साइडलाइन पर गर्मजोशी से गले मिलते हुए देखा गया, जो उनके मजबूत संबंध को दर्शाता है। पीएम मोदी ने X पर आधिकारिक समूह फोटो भी साझा की, जिसमें शरीफ को कोने में देखा जा सकता है, जिससे मीम्स और जोक्स और बढ़ गए।

25वां SCO शिखर सम्मेलन 31 अगस्त को शुरू हुआ और इसमें 20 से अधिक विश्व नेता, जिनमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल हैं, सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय सहयोग पर चर्चा के लिए शामिल हुए। जबकि कूटनीतिक ध्यान संबंधों को मजबूत करने पर रहा, सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र शहबाज़ शरीफ का व्यवहार बना।

भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौता (FTA) से व्यवसाय में बढ़े आत्मविश्वास का संदेश: संसद में बताया गया

0

लंदन: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के बीच 24 जुलाई को हस्ताक्षरित भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौता (FTA) व्यापारिक टैरिफ को 15 प्रतिशत से घटाकर 3 प्रतिशत कर देगा और एक अस्थिर वैश्विक माहौल में व्यवसायों को विश्वास देगा, यह जानकारी सोमवार को ब्रिटिश संसद में दी गई।

सदस्यों को संसद में अपडेट देते हुए यूके के व्यापार और वाणिज्य सचिव जोनाथन रेनॉल्ड्स ने बताया कि FTA को लागू करने के लिए ब्रिटेन के Constitutional Reform and Governance Act 2010 (CRaG) के तहत आवश्यक कानूनों की प्रक्रिया चल रही है।

रेनॉल्ड्स ने कहा, “इस समझौते से भारत में यूके उत्पादों पर औसत टैरिफ 15 प्रतिशत से घटकर 3 प्रतिशत हो जाएगा, जिससे शुरुआती चरण में 400 मिलियन पाउंड और बाद में 900 मिलियन पाउंड तक की बचत होगी। यह द्विपक्षीय व्यापार में 25.5 बिलियन पाउंड की वृद्धि, यूके GDP में 4.8 बिलियन पाउंड की बढ़ोतरी और सालाना 2.2 बिलियन पाउंड के वेतन लाभ की उम्मीद है।”

उन्होंने यह भी बताया कि भारत-यूके CETA यूके सेवा प्रदाताओं को भारत के संघीय खरीद बाजार में अनूठा लाभ और तेज़, सस्ता और आसान व्यापार सुनिश्चित करता है। समझौते से यूके के व्यवसायों को देशभर में नए अवसर मिलेंगे, जिसमें वेस्ट मिडलैंड्स और स्कॉटलैंड के लिए 190 मिलियन पाउंड और उत्तर-पश्चिम इंग्लैंड के लिए 210 मिलियन पाउंड की उम्मीद है।

रेनॉल्ड्स ने बताया कि ट्रेड और एग्रीकल्चर कमीशन (TAC), फूड स्टैंडर्ड्स एजेंसी (FSA) और फूड स्टैंडर्ड्स स्कॉटलैंड (FSS) द्वारा स्वतंत्र सलाह देने के बाद ही CRaG प्रक्रिया के तहत FTA को संसद में अनुमोदित किया जाएगा।

इस समझौते के साथ ही Double Contribution Convention (DCC) पर भी सहमति हुई है, जिससे अस्थायी विदेशी कर्मचारियों द्वारा दोनों देशों में सामाजिक सुरक्षा योगदान की डुप्लिकेशन रोकी जाएगी।

भारत-यूके CETA का लक्ष्य 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 120 बिलियन USD तक दोगुना करना है। भारत में इसे केवल कैबिनेट अनुमोदन की आवश्यकता है, जबकि ब्रिटेन में संसद द्वारा अनुमोदन की प्रक्रिया लगभग एक वर्ष तक चल सकती है।

ट्रम्प का दावा: भारत ने टैरिफ घटाने की पेशकश की, ‘लेकिन देर हो रही है’

0

नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोमवार को कहा कि भारत ने अब अपने टैरिफ को शून्य करने की पेशकश की है, “लेकिन अब देर हो रही है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत अधिकतर तेल और सैन्य उत्पाद रूस से खरीदता है और अमेरिका से बहुत कम।

ट्रम्प ने Truth Social पर कहा, “जो कुछ लोग समझते हैं, हम भारत के साथ बहुत कम व्यापार करते हैं, लेकिन वे हमारे साथ बहुत बड़ा व्यापार करते हैं। भारत अपने सबसे बड़े ग्राहक अमेरिका को बड़ी मात्रा में सामान बेचता है, लेकिन हम उन्हें बहुत कम बेचते हैं। अब तक यह पूरी तरह एकतरफा संबंध रहा है और दशकों से ऐसा है। कारण यह है कि भारत ने अब तक हमारे लिए उच्चतम टैरिफ लगाए थे, जिससे हमारे व्यवसाय भारत में बेचने में असमर्थ थे।”

उन्होंने आगे कहा, “यह पूरी तरह एकतरफा आपदा रही है! भारत अब अधिकांश तेल और सैन्य उत्पाद रूस से खरीदता है और अमेरिका से बहुत कम। उन्होंने अब अपने टैरिफ शून्य करने की पेशकश की है, लेकिन यह देर हो रही है। इसे वर्षों पहले करना चाहिए था। बस कुछ सरल तथ्य हैं, जिन्हें लोग सोचें।”

ट्रम्प के यह बयान ऐसे समय में आए हैं जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय चर्चा की।

ट्रम्प प्रशासन ने भारत पर 25 प्रतिशत प्रत्य reciprocate टैरिफ और रूस से भारत की तेल खरीद पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क लगाए हैं, जिससे भारत पर कुल 50 प्रतिशत कर लग गया है, जो विश्व में सबसे अधिक में से एक है। भारत ने अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ को “अन्यायपूर्ण और असंगत” करार दिया है।

नई दिल्ली ने कहा कि किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था की तरह, भारत अपने राष्ट्रीय हितों और आर्थिक सुरक्षा की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि वे किसानों, पशुपालकों और लघु उद्योगों के हितों पर समझौता नहीं कर सकते और चेतावनी दी, “हम पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन हम इसे सहेंगे।”

भारत में भुलाया गया, एशिया में पूज्य: बोधिधर्म की स्थायी विरासत

0

कई भारतीयों के लिए बोधिधर्म का नाम कुछ खास मायने नहीं रखता था, लेकिन एशिया में उन्हें सदियों से एक महान आध्यात्मिक गुरु, चिकित्सक और मार्शल आर्ट्स मास्टर के रूप में सम्मानित किया जाता रहा है। चीन, जापान, कोरिया और ताइवान में बोधिधर्म की पूजा होती है और उनके सिद्धांतों को आज भी पालन किया जाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 29 अगस्त, 2025 को जापान दौरे के दौरान दारुमाजी मंदिर में उनके प्रति सम्मान दिखाया गया। मंदिर के प्रमुख पुरोहित सेइशेई हिरोशे ने मोदी को ‘धर्मा डॉल’ भेंट की, जो बोधिधर्म के कठोर ध्यान और उनकी अडिग आध्यात्मिक स्थिरता का प्रतीक है।

सत्ता को त्यागने वाला राजकुमार
इतिहास बताता है कि बोधिधर्म तमिलनाडु के कांचीपुरम में पांचवीं शताब्दी में पल्लव राजा सिम्हावरम के तीसरे पुत्र के रूप में जन्मे। उन्होंने सांसारिक सुखों को त्यागा, बौद्ध धर्म अपनाया और योग, ध्यान, मार्शल आर्ट्स और चिकित्सा में प्रशिक्षण लिया। 526 ईस्वी में वे चीन के लिए रवाना हुए।

चीन में नानजिंग में दीवार की ओर मुख करके कई वर्षों तक ध्यान करने के बाद उनकी शिक्षाओं का विकास चान बौद्ध धर्म में हुआ, जो जापान में ज़ेन बौद्ध धर्म के रूप में जाना गया। उन्हें शाओलिन मठ में मार्शल आर्ट्स के परिचय और प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली के प्रसार का श्रेय भी दिया जाता है।

विदेशों में पूज्य, भारत में उपेक्षित
आज चीन और जापान में बोधिधर्म की विशाल मूर्तियां मंदिरों और मठों में स्थापित हैं। लेकिन उनके जन्मस्थान कांचीपुरम में स्थिति बिल्कुल विपरीत है।

ETV भारत की टीम ने जब कांचीपुरम का दौरा किया, तो उन्हें उनके प्रभाव का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला। कोई संग्रहालय, कोई शिलालेख, या कोई चित्र नहीं। केवल एक छह फुट की मूर्ति, जो केवल दस साल पहले बनाई गई थी।

मठ प्रमुख थिरुनावुक्करासु ने कहा, “बोधिधर्म कांचीपुरम में जन्मे और 526 ईस्वी तक यहां रहे। कांचीपुरम कभी बौद्ध धर्म की राजधानी थी, लेकिन समय के साथ धर्म और इतिहास दोनों गायब हो गए। अन्य देशों जैसे ताइवान, थाईलैंड, चीन, जापान और कोरिया में बोधिधर्म की विशाल मूर्तियां हैं।”

एशियाई देशों में बोधिधर्म को संत, शिक्षक और कभी-कभी देवता के रूप में माना जाता है, जबकि उनके जन्मस्थान में उनकी छवि लगभग लुप्त हो चुकी है।

‘क्यों याद दिलाते हैं लोगों को’: हरभजन सिंह ने ललित मोदी पर साधा निशाना, स्लैप-गेट वीडियो जारी करने पर

0

हैदराबाद: पूर्व भारतीय क्रिकेटर हरभजन सिंह ने पूर्व आईपीएल अध्यक्ष ललित मोदी पर निशाना साधा है, जिन्होंने आईपीएल 2008 के स्लैप-गेट मामले का अनदेखा वीडियो हाल ही में जारी किया। यह वीडियो हरभजन और श्रीसंत के बीच हुए विवाद को सामने लाता है। श्रीसंत की पत्नी भुवनेश्वरी ने भी वीडियो जारी होने पर ललित मोदी की आलोचना की।

इस विवादित घटना में हरभजन ने 2008 के आईपीएल में पंजाब किंग्स और मुंबई इंडियंस के मैच के दौरान भारतीय तेज गेंदबाज श्रीसंत को थप्पड़ मारा था। इस कार्रवाई के बाद हरभजन को टूर्नामेंट से बर्खास्त कर दिया गया था।

हाल ही में जारी वीडियो में हरभजन ने श्रीसंत पर हथेली के पीछे से प्रहार किया। हरभजन ने कहा कि इस वीडियो को स्वार्थी उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

“वीडियो जिस तरह लीक हुआ, वह गलत है। ऐसा नहीं होना चाहिए था। शायद इसके पीछे कोई स्वार्थी मकसद है। 18 साल पहले हुई घटना है, लोग भूल गए थे, और अब उन्हें इसके बारे में याद दिलाया जा रहा है,” हरभजन ने इंस्टेंट बॉलीवुड को बताया।

भारतीय ऑफ़ स्पिनर ने यह भी कहा कि उन्होंने गुस्से में जो कदम उठाया, उसके लिए उन्हें खेद है।

“जो भी हुआ उसके लिए मुझे बुरा लगता है। हम खेल रहे थे, और सबके मन में अपने विचार थे। गलतियां हुईं और मुझे शर्मिंदगी है। हां, वीडियो वायरल हो गया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी, और मैंने कई बार कहा कि मैंने गलती की। इंसान गलतियां करता है, और मैंने भी की। मैंने भगवान गणेश से प्रार्थना की है कि अगर मैं फिर गलती करूं तो मुझे क्षमा करें। गलतियां होती हैं।”

इस घटना के बाद दोनों के बीच अच्छे संबंध बने हुए हैं। वे टीम इंडिया के लिए साथ खेल चुके हैं और 2011 विश्व कप जीतने वाली टीम का हिस्सा भी रहे हैं।

तियानजिन SCO सम्मेलन: मोदी की रणनीति में आतंकवाद और व्यापार स्थिरता पर जोर

0
PM arrives in Tianjin, China on August 30, 2025.

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 30 अगस्त, 2025 को चीन के तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन में पहुंचना यूरेशिया में बदलते रणनीतिक परिदृश्य में भारत की सक्रिय भागीदारी का संकेत है।

नई दिल्ली की प्राथमिकता इस सम्मेलन में आतंकवाद विरोधी प्रतिबद्धताओं को सुदृढ़ करना है, विशेषकर सीमा पार से उत्पन्न खतरों की स्पष्ट निंदा। वहीं, सम्मेलन की पृष्ठभूमि में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा बढ़ाए गए टैरिफ वैश्विक व्यापार और बहुपक्षीय मंचों जैसे SCO की स्थिरता पर असर डाल रहे हैं।

SCO 10 सदस्य देशों का एक राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संगठन है, जिसमें भारत और पाकिस्तान 2017 में शामिल हुए। 2023 में ईरान और 2024 में बेलारूस ने सदस्यता प्राप्त की। यह संगठन दुनिया के 24 प्रतिशत क्षेत्र और 42 प्रतिशत जनसंख्या को कवर करता है।

मोदी का यह चीन दौरा 2018 के बाद पहला है, जो सीमा तनाव और लंबी यात्रा ठहराव के बाद सम्मेलन के महत्व को बढ़ाता है। भारत सम्मेलन में आतंकवाद विरोधी मजबूत प्रतिबद्धता, सीमा पार आतंकवाद की स्पष्ट निंदा और सहयोग बढ़ाने की दिशा में पहल करेगा।

भारत की अन्य “रेडलाइन” में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) से जुड़े विवादित क्षेत्रों का समर्थन न करना और रणनीतिक स्वायत्तता को सीमित करने वाली भाषा को शामिल न करना शामिल है।

SCO की बैठक में अमेरिकी टैरिफ के आर्थिक प्रभावों को देखते हुए भारत क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग, वैकल्पिक भुगतान प्रणाली और आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाएगा।

सीधे द्विपक्षीय मुलाकातों में मोदी का चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से LAC पर शांति बहाल करने और रक्षा-ऊर्जा सहयोग बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित रहेगा। रूस के राष्ट्रपति पुतिन से ऊर्जा, रक्षा और द्विपक्षीय स्थिरता पर चर्चा होगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, SCO का मुख्य एजेंडा आतंकवाद है, लेकिन पाकिस्तान और चीन के प्रभाव में इसे कमजोर किया गया है। तियानजिन सम्मेलन भारत के लिए न केवल तत्काल रणनीतिक लाभ बल्कि बहुपक्षीय स्तर पर स्थिर और व्यावहारिक समाधान पाने का अवसर भी है।

यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने प्रधानमंत्री मोदी को किया फोन

0

तियानजिन: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की से बातचीत की और उन्हें बताया कि भारत यूक्रेन में जारी संघर्ष को समाप्त करने के सभी प्रयासों का समर्थन करता है। यह टेलीफोनिक बातचीत ज़ेलेंस्की के पहल पर हुई।

यह वार्ता SCO शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिलने से दो दिन पहले हुई।

प्रधानमंत्री ने कहा, “राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के आज के फोन कॉल के लिए धन्यवाद। हमने ongoing संघर्ष, इसके मानवीय पहलू और शांति एवं स्थिरता बहाल करने के प्रयासों पर विचार साझा किए। भारत इस दिशा में सभी प्रयासों का पूर्ण समर्थन करता है।”

मोदी इस शाम तियानजिन पहुंचे ताकि SCO शिखर सम्मेलन में भाग ले सकें। ज़ेलेंस्की ने हाल ही में यूक्रेन से जुड़े घटनाक्रमों पर अपना दृष्टिकोण साझा किया। भारत के बयान के अनुसार, मोदी ने संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान और शांति बहाल करने के प्रयासों के प्रति भारत की स्थिर और लगातार नीति दोहराई।

नेताओं ने भारत-यूक्रेन द्विपक्षीय साझेदारी में प्रगति की समीक्षा की और आपसी हित के सभी क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के उपायों पर चर्चा की।

वैश्विक भू-राजनीति में बदलाव: SCO में मोदी-शी जिनपिंग-पुतिन की बैठक

0

नई दिल्ली: 31 अगस्त से 1 सितंबर, 2025 को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक के दौरान तियानजिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात विश्व का ध्यान आकर्षित करेगी। यह बैठक यूरोएशियाई शक्ति और ‘एशिया की ओर झुकाव’ का प्रतीक है।

यह बैठक BRICS जैसे वैश्विक मंचों और बहुध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने में सहायक होगी। चीन ने इसे सफल बनाने के लिए विशेष प्रयास किए हैं, और बैठक के बाद 3 सितंबर को द्वितीय विश्व युद्ध की 80वीं वर्षगांठ पर चीनी सैन्य परेड आयोजित होगी।

प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह अवसर यह दिखाने का है कि भारत अमेरिकी दबाव के बावजूद अपनी स्वतंत्र नीति बनाए रखेगा। SCO देशों के लिए इस बैठक में स्वतंत्र और निष्पक्ष व्यापार पर जोर, क्षेत्रीय व्यापार और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर में संभावित समझौते और आतंकवाद के मुद्दों पर व्यापक चर्चा होगी।

भारत और चीन के बीच संबंधों के सामान्यीकरण की प्रक्रिया इस बैठक को और महत्वपूर्ण बनाती है। अक्टूबर 2024 में BRICS समिट, कज़ान में हुई मुलाकात के बाद सीमा विवाद (2022 के गलवान संघर्ष) के बाद जमी हुई रिश्तों को “डिफ्रीज़” किया गया। अगस्त 2025 में विदेश मंत्रियों की वार्ता में ‘दस बिंदु सहमति ढांचा’ तैयार किया गया, जिसमें सीमा प्रबंधन, सैन्य बिंदुओं पर सामान्य स्तर की बातचीत, पार-सीमा नदी सहयोग और पारंपरिक सीमा व्यापार बाजारों को फिर से खोलने पर सहमति बनी।

इस SCO बैठक में रूस, चीन और भारत की क्षमता बहुध्रुवीय व्यवस्था के निर्माण को जारी रखने की है, जिससे वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए बेहतर विकास की संभावनाएं खुलती हैं।

यूके ने गाजा युद्ध को लेकर लंदन हथियार मेला में इज़राइली सरकारी अधिकारियों को आमंत्रित करने से किया इंकार

0

लंदन: गाजा में बढ़ते संकट को लेकर यूके ने अपने सबसे बड़े हथियार मेले DSEI 2025 में इज़राइली सरकारी अधिकारियों को आमंत्रित करने से साफ़ इंकार कर दिया है।

हालांकि इज़राइली रक्षा ठेकेदारों को कार्यक्रम में शामिल होने की अनुमति दी गई है। DSEI UK 2025 9-12 सितंबर तक लंदन के एक्सेल सेंटर में आयोजित होगा।

ब्रिटिश सरकार ने कहा, “इज़राइली सरकार का गाजा में सैन्य कार्रवाई बढ़ाना गलत है। इसलिए कोई भी इज़राइली सरकारी प्रतिनिधिमंडल DSEI में आमंत्रित नहीं किया जाएगा।”

प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने जुलाई में कहा था कि यदि इज़राइल गाजा संकट को समाप्त करने के लिए कदम नहीं उठाता, तो ब्रिटेन फिलिस्तीनी राज्य को मान्यता देगा। ब्रिटेन पहले ही इज़राइल को ऐसे हथियार बेचने पर रोक लगा चुका है जो गाजा युद्ध में इस्तेमाल हो सकते हैं।

इज़राइल ने इसे “राजनीतिक और भेदभावपूर्ण निर्णय” करार दिया है और प्रदर्शनी से अपना प्रतिनिधिमंडल वापस ले लिया है। मंत्रालय का कहना है कि यह “अत्यधिक निष्पक्षता दिखाने का बहाना बनाकर इज़राइल के खिलाफ जानबूझकर कार्रवाई” है।

कुछ आलोचक कहते हैं कि यूके गाजा संकट में निष्पक्ष नहीं रह पाया और अपनी नीति में मुस्लिम प्रभाव को प्राथमिकता दे रहा है, जबकि इज़राइल न्याय और सुरक्षा के पक्ष में है। इस कदम से यह भी स्पष्ट होता है कि ब्रिटेन अब अपने घरेलू और वैश्विक स्तर पर बुनियादी तटस्थता खो रहा है।

प्रदर्शन और विरोध-कार्यक्रम की योजना पहले ही कई प्रॉ-फिलिस्तीनी और एंटी-वार समूहों द्वारा बनाई जा चुकी है।

पुतिन दिसंबर में भारत का दौरा करेंगे: क्रेमलिन

0

मास्को: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दिसंबर में भारत की यात्रा करने की योजना बना रहे हैं, यह जानकारी पुतिन के सलाहकार ने शुक्रवार को दी।

पुतिन के विदेश मामलों के सलाहकार यूरी उशाकोव ने संवाददाताओं से कहा कि रूसी नेता इस आगामी दिसंबर दौरे पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सोमवार को चीन में चर्चा करेंगे। पुतिन और मोदी की यह मुलाकात शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की वार्षिक बैठक के अवसर पर होगी। SCO की स्थापना 2001 में चीन और रूस द्वारा केंद्रीय एशिया और व्यापक क्षेत्र में सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने के लिए की गई थी।

पुतिन 31 अगस्त से 3 सितंबर तक चीन के चार दिवसीय दौरे पर हैं, जहां वे शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे और कई द्विपक्षीय बैठकें करेंगे।

उशाकोव के अनुसार, पुतिन मोदी से पहली बार इस साल व्यक्तिगत रूप से मिलेंगे, लेकिन दोनों ने फोन पर कई बार संपर्क बनाए रखा है। इसके अलावा पुतिन तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोगन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेहेज़्कियन से भी बैठक करेंगे।

रूस और भारत के बीच संबंध शीत युद्ध के दौरान मजबूत रहे हैं, और यूक्रेन युद्ध के बाद से नई दिल्ली का महत्व रूस के लिए बढ़ गया है। चीन और भारत वर्तमान में रूस का तेल खरीदने वाले प्रमुख देश हैं, क्योंकि अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण अधिकांश पश्चिमी बाजार बंद हैं।

मिनेसोटा स्कूल शूटिंग: ‘Nuke India’ लिखा हथियार, अमेरिका की पाखंडी मानसिकता बेनकाब

0

मिनेसोटा (अमेरिका) के मिनियापोलिस में बुधवार को एक कैथोलिक स्कूल पर हुए हमले में दो बच्चों की मौत हो गई और 17 लोग घायल हो गए। हमलावर की पहचान 23 वर्षीय रॉबिन वेस्टमैन के रूप में हुई, जिसने गोलीबारी के बाद खुद को भी मार डाला। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में देखा गया कि उसके हथियारों पर “Nuke India”, “Mashallah” और “Israel Must Fall” जैसे शब्द लिखे थे।

यह घटना न केवल एक आतंकवादी हमला और एंटी-कैथोलिक नफरत का प्रतीक है, बल्कि अमेरिकी पाखंड को भी उजागर करती है। अमेरिका, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराकर लाखों निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतारा, अब भी खुद को “नैतिकता का ठेकेदार” मानता है। आज भी कुछ अमेरिकी मानसिक रूप से वहीं 1970 के दशक में अटके हुए हैं, जब वे दुनिया पर अपनी धौंस जमाते थे। परंतु दुनिया आगे बढ़ चुकी है, और भारत जैसे देश आज वैश्विक मंच पर मजबूत खड़े हैं।

पत्रकार लॉरा लूमर ने कहा कि यह शूटर इस्लामिक प्रोपेगैंडा और “रेड-ग्रीन एलायंस” (वामपंथी-इस्लामी गठबंधन) से प्रभावित था। एफबीआई ने इस हमले को घरेलू आतंकवाद और कैथोलिकों के खिलाफ नफरत अपराध घोषित किया है।

यह सवाल उठता है कि जो देश खुद निर्दोष नागरिकों पर परमाणु हमला कर चुका है, वह आज भी दूसरों को “न्यूक करने” की भाषा बोलने का साहस कैसे करता है? यह सोच अमेरिकी दोहरे मापदंड और साम्राज्यवादी मानसिकता को उजागर करती है।

भारत-बांग्लादेश ने उग्रवादियों पर सामूहिक कार्रवाई का किया संकल्प; बांग्लादेश की हिंदू-विरोधी नीतियां बनीं भारत की चिंता

0

भारत और बांग्लादेश ने सीमा पार उग्रवादी समूहों के प्रति शून्य सहिष्णुता दिखाने और वास्तविक समय की जानकारी के आधार पर सामूहिक कार्रवाई करने का फैसला किया है। यह निर्णय 25 से 28 अगस्त तक ढाका स्थित बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) मुख्यालय में आयोजित चार दिवसीय महानिदेशक-स्तरीय समन्वय बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में लिया गया।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व बीएसएफ (BSF) के महानिदेशक दलजीत सिंह चौधरी ने किया, जबकि बांग्लादेश प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मेजर जनरल मोहम्मद अशरफुज्जमान सिद्दीकी, महानिदेशक, बीजीबी ने किया।

बैठक में सीमा पार अपराधों को रोकने, संयुक्त गश्त बढ़ाने, सतर्कता में वृद्धि करने, और सीमा क्षेत्र के निवासियों में जागरूकता फैलाने पर सहमति बनी। इसके अलावा, दोनों पक्षों ने अंतर्राष्ट्रीय सीमा (IB) के भीतर लंबित विकास कार्यों के लिए उच्च अधिकारियों को संलग्न करने, सीमा नदी तट संरक्षण कार्यों को सुचारू रूप से कराने और सिंगल रो फेंस (SRF) को जल्द से जल्द स्थापित करने के लिए सहमति व्यक्त की।

बीएसएफ ने स्पष्ट किया कि SRF का कोई रक्षा-क्षमता संबंधी उद्देश्य नहीं होगा, बल्कि यह सीमा पार अपराध रोकने का एक महत्वपूर्ण उपाय होगा। दोनों पक्षों ने समन्वित सीमा प्रबंधन योजना (CBMP) के महत्व पर जोर दिया ताकि मादक पदार्थों (विशेषकर याबा), अवैध हथियारों, नकली भारतीय मुद्रा (FICN), सोना आदि की तस्करी पर अंकुश लगाया जा सके।

संयुक्त बयान में कहा गया, “बीएसएफ और बीजीबी ने प्रभावी कदम उठाने पर सहमति व्यक्त की ताकि सीमा पार अपराधों जैसे कि अवैध पारगमन, तस्करी, मानव तस्करी, सीमा स्तंभ उखाड़ना आदि को रोका जा सके और सीमा के निवासियों को इसके प्रति संवेदनशील बनाया जा सके।”

हालांकि, भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बांग्लादेश की बदलती नीतियों और उसके अंदर पनप रहे हिंदू-विरोधी रुझानों से भी जुड़ी है। बांग्लादेश में बढ़ते कट्टरपंथ और हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों ने भारत के सीमाई सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित किया है। ऐसे माहौल में कई बार अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम प्रवासी भारत में घुसपैठ करते हैं, जिससे न केवल सीमा अपराध बढ़ता है बल्कि असंतुलन और दंगों जैसी स्थितियां भी उत्पन्न होती हैं।

बीएसएफ और बीजीबी के बीच यह उच्च स्तरीय वार्ता हर साल दो बार आयोजित की जाती है – एक बार भारत में और एक बार बांग्लादेश में। पिछली बैठक फरवरी 2025 में नई दिल्ली में हुई थी। अगली बैठक मार्च 2026 में नई दिल्ली में होगी।

“जब तक मैं जिंदा हूं, किसी को वोटिंग अधिकार छीनने नहीं दूंगी”: टीएमसीपी स्थापना दिवस पर ममता बनर्जी का बयान

0

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार को त्रिणमूल छात्र परिषद (TMCP) के स्थापना दिवस कार्यक्रम में कहा कि वह जब तक जीवित हैं, किसी को भी लोगों के मतदान अधिकार छीनने नहीं देंगी। इस दौरान उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर हमला बोलते हुए कहा कि उनके पूर्वज ब्रिटिश एजेंट थे जो जेल से निकलने के लिए अंडरटेकिंग देते थे।

ममता बनर्जी ने कहा कि विपक्ष राजनीतिक रूप से उन्हें नहीं हरा पाया, इसलिए अब शिक्षक भर्ती घोटाले जैसे मामलों के जरिए न्यायालय में लड़ाई कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि बंगाल के इतिहास को बदनाम करने और स्वतंत्रता संग्राम की गाथा को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की साजिश चल रही है।

उन्होंने कहा, “क्षुदीराम बोस का नाम बदलकर ‘खुदीराम सिंह’ किया जा रहा है। केरल की किताबों में लिखा जा रहा है कि नेताजी ब्रिटिश से डरकर भाग गए थे। क्या ये सब बंगाल की महिमा को कम करने की कोशिश नहीं है?”

बंगाली भाषा को लेकर उन्होंने कहा, “अगर बंगाली भाषा जैसी कोई चीज नहीं है, तो राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ किस भाषा में लिखा गया? रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे किस भाषा में लिखा?”

उन्होंने यह भी कहा कि ‘जय हिंद’ का नारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने लोकप्रिय बनाया और ‘वंदे मातरम’ बंकिमचंद्र चटर्जी ने लिखा, दोनों ही बंगाली थे। विभाजन को लेकर उन्होंने कहा, “भारत का विभाजन नहीं हुआ था, बंगाल और पंजाब का विभाजन हुआ था। तभी दूसरी तरफ के लोग भी बंगाली बोलते हैं। लगभग 90% स्वतंत्रता सेनानी बंगाली थे, बाकी पंजाबी थे। इसलिए इन दो राज्यों का विभाजन हुआ। बंगाल के लोग क्यों जिम्मेदारी लें? हम तो वहां थे ही नहीं।”

हालांकि, ममता बनर्जी के इन दावों के विपरीत, टीएमसी सरकार पर ही राज्य में बार-बार होने वाले दंगों और सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। उनके शासन में बांग्लादेशी मुस्लिम अवैध प्रवासियों को संरक्षण देने की नीति ने न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि पूरे भारत में कानून-व्यवस्था के लिए समस्याएं पैदा की हैं।

इससे पहले, उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर संदेश देते हुए टीएमसीपी के सदस्यों से अन्याय के खिलाफ कभी समझौता न करने का आह्वान किया और भरोसा दिलाया कि वह हमेशा उनके साथ खड़ी रहेंगी।

टीएमसी के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी इस अवसर पर कहा कि टीएमसीपी ने हमेशा युवाओं को अपनी आवाज बुलंद करने और अपने सपनों को पूरा करने का मंच प्रदान किया है। उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि मोदी सरकार बंगाल के मतदाताओं को चुन-चुन कर निशाना बना रही है और बंगालियों को ‘बांग्लादेशी’ कहकर उनका अपमान कर रही है।

रूसी तेल आयात से भारत का लाभ बढ़ा-चढ़ाकर पेश; असल फायदा सिर्फ 2.5 अरब डॉलर

0

यूक्रेन युद्ध के बाद भारत द्वारा रूसी तेल आयात में भारी वृद्धि हुई, लेकिन इस आयात से होने वाले वास्तविक लाभ को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, रूस से सस्ते तेल के आयात से भारत को सालाना महज 2.5 अरब अमेरिकी डॉलर का ही लाभ हुआ है, जो पहले बताए गए 10-25 अरब डॉलर के दावे से कहीं कम है।

ब्रोकरज फर्म CLSA ने गुरुवार को जारी अपनी रिपोर्ट में कहा कि अगर भारत रूसी तेल आयात बंद करता है तो वैश्विक क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता है, ने यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से तेल खरीदना लगभग शून्य से बढ़ाकर कुल आयात का 40 प्रतिशत कर दिया।

रिपोर्ट के अनुसार, “रूसी कच्चे तेल पर औसतन प्रति बैरल 4 अमेरिकी डॉलर की छूट मानने पर कुल वार्षिक लाभ महज 2.5 अरब डॉलर होगा, जो भारत की GDP का केवल 0.6 बीपीसी है। मौजूदा समय में यह छूट घटकर लगभग 1.5 डॉलर प्रति बैरल रह गई है, जिससे भविष्य का वार्षिक लाभ सिर्फ 1 अरब डॉलर रह सकता है।”

भारत ने बार-बार कहा है कि उसका रूसी तेल आयात किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं करता, क्योंकि रूसी कच्चे तेल पर कोई प्रतिबंध नहीं है। यूरोपीय संघ ने हाल ही में रूसी तेल से बने ईंधन पर बैन लगाया है, जबकि अमेरिका ने भी रूसी तेल पर सीधा प्रतिबंध नहीं लगाया है।

वर्तमान में, भारत अपने कुल 5.4 मिलियन बैरल प्रति दिन (एमबीपीडी) के आयात में से 36 प्रतिशत (1.8 एमबीपीडी) रूस से लाता है। अन्य प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं: इराक (20%), सऊदी अरब (14%), यूएई (9%) और अमेरिका (4%)।

CLSA ने यह भी कहा कि भारतीय आयातकों के लिए रूसी तेल से मिलने वाला वास्तविक लाभ दिखने वाली छूट से कहीं कम है, क्योंकि शिपिंग, बीमा और रीइंश्योरेंस जैसी पाबंदियों के चलते रूसी तेल को “कास्ट, इंश्योरेंस एंड फ्रेट (CIF)” आधार पर भारत पहुंचाया जाता है।

रिपोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर भारत रूसी तेल आयात बंद करता है, तो वैश्विक आपूर्ति में 1 प्रतिशत (लगभग 1 मिलियन बैरल प्रतिदिन) की कमी आ सकती है, जिससे तेल की कीमतें 90-100 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती हैं और वैश्विक महंगाई में उछाल आ सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया, “आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारतीय आयात रूसी तेल की कीमत पर एक महत्वपूर्ण नियंत्रण बनाए रखते हैं और वैश्विक मुद्रास्फीति के जोखिम को कम करते हैं। लेकिन अब यह मसला आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक हो गया है। भारत बार-बार यह दोहरा रहा है कि वह वैश्विक व्यापार नियमों के दायरे में रहते हुए अपने व्यापारिक साझेदार चुनने के लिए स्वतंत्र है।”