Saturday 27th of June 2026 09:06:03 PM
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आतंकी हमले के ठीक बाद IMF फिर से पाकिस्तान को देगा भीख – ‘जलवायु लचीलापन’ के नाम पर USD 1.3 अरब का नया पैकेज!

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वाह IMF, क्या ही वक्त पर टाईमिंग है! अभी कुछ ही दिन पहले कश्मीर में निर्दोषों पर हमला हुआ, और अब आप एक ऐसे देश को USD 1.3 अरब का ‘जलवायु लचीलापन’ पैकेज देने जा रहे हैं, जो न सिर्फ आतंकियों का पालक है, बल्कि उनका एक्सपोर्ट हब भी।

पाकिस्तान, जहाँ ‘जलवायु’ से ज़्यादा ‘जेहादी उर्वरता’ में रुचि दिखाई देती है, उसे फिर से अंतरराष्ट्रीय भिक्षा का थैला पकड़ा दिया गया है। IMF के एग्जीक्यूटिव बोर्ड की मीटिंग 9 मई को होनी है – बकायदा स्टाफ लेवल एग्रीमेंट भी हो चुका है, और $1 अरब की अगली किश्त लाइन में है।

हम तो बस 9 से 5 की नौकरी करने वाले मामूली लोग हैं, लेकिन सोच रहे हैं – क्या ‘क्लाइमेट रेसिलिएंस’ का मतलब अब आतंकवाद झेलने वाले देशों की फ़ंडिंग करना हो गया है?

कश्मीर में हमला करने वाले क्या पेड़-पौधों की बात कर रहे थे? या ये सब इसलिए माफ़ किया जा रहा है क्योंकि “जलवायु परिवर्तन” अब नया ग्लोबल बहाना है? आतंकवाद को स्पॉन्सर करने के बाद भी पाकिस्तान ‘हेल्पलेस विक्टिम’ बनकर पैसा खींच रहा है – और IMF मुस्कुराते हुए चेक साइन कर रहा है।

और हां, यह वही पाकिस्तान है जिसे पहले से ही USD 7 अरब का बेलआउट पैकेज मिल चुका है, और अब नया प्लान बन रहा है, ताकि “मजबूत और समावेशी विकास” हो सके। यानी, आतंक फैलाने का नया, जलवायु-अनुकूल तरीक़ा।

क्लाइमेट रेसिलिएंस? भाई, पहले जेहादी रेसिलिएंस को तो ख़त्म करो।

IMF मिशन चीफ़ ने कहा, “प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन अच्छा चल रहा है।” हाँ, मतलब बजट से टेरर ट्रेनिंग सेंटर चलाने के लिए डाटा शीट सबमिट कर दी है।

हम सोचते हैं – क्या दुनिया इतनी थक चुकी है कि अब नीतियाँ Excel शीट और buzzwords के हिसाब से चलेंगी, चाहे कोई देश आतंक का नर्सरी बना बैठा हो?

क्या आप तैयार हैं अगली किश्त की खबर पर ताली बजाने के लिए?

PoK को भारत में मिलाने की मांग आत्मघाती — जब कश्मीर ही जिहादी बन चुका है तो PoK क्या लाएगा

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दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज द्वारा की गई यह मांग कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) को भारत में शामिल किया जाए, पहली नज़र में देशभक्ति की तरह प्रतीत हो सकती है। लेकिन अगर ज़मीनी सच्चाई को देखा जाए, तो यह मांग राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकती है। जब आज का कश्मीर ही भारत विरोधी, जिहादी मानसिकता से ग्रसित हो चुका है, तो उस जहर से सने हुए PoK को अपने देश में लाना क्या समझदारी होगी?

कश्मीर — आतंक का गढ़ बन चुका है

हाल ही में पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यह हमला सिर्फ़ सीमा पार से नहीं हुआ, बल्कि इसमें अंदरूनी यानी स्थानीय समर्थन भी था। कोई भी आतंकी संगठन किसी स्थान को बिना स्थानीय सहायता और संपर्क के टारगेट नहीं कर सकता। इसका मतलब साफ है: कश्मीर के भीतर भी जिहादी विचारधारा पनप रही है, और वहां की प्रशासनिक मशीनरी कहीं न कहीं इस खतरे को नज़रअंदाज़ कर रही है या फिर उसमें मिलीभगत है।

Kashmiri शासन और कट्टरपंथ

कश्मीर का राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक तंत्र वर्षों से मुस्लिम तुष्टिकरण और अलगाववादी मानसिकता को संरक्षण देता आया है। जब कोई हमला होता है, तो बयानबाज़ी होती है — लेकिन कठोर कदम उठाने से हर सरकार कतराती रही है, चाहे वो UPA हो या NDA। अब अगर PoK को भारत में मिला दिया जाए, तो सोचिए, वहां की 100% मुस्लिम आबादी, जो दशकों से भारत के खिलाफ़ जहर उगलती आ रही है, वो भारत के अन्य हिस्सों में भी खुली छूट पा जाएगी।

PoK — सिर्फ़ एक ज़मीन नहीं, आतंक का प्लांट

PoK अब एक ‘इलाका’ नहीं है। यह एक आतंकी नेटवर्क का अड्डा बन चुका है। वहां से सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि सोशल मीडिया, धार्मिक कट्टरपंथ और प्रशिक्षित आतंकी भारत में भेजे जाते हैं। वहां की मस्जिदों और मदरसों में जो पाठ पढ़ाए जाते हैं, वो सीधे-सीधे हिंदुस्तान और हिंदुओं के खिलाफ होते हैं।

अब कल्पना कीजिए कि अगर यह क्षेत्र भारत का हिस्सा बनता है और वहां के लोगों को आधार कार्ड, वोटिंग अधिकार, सब्सिडी, और नौकरियों में आरक्षण मिल जाता है, तो क्या होगा? क्या यह आतंकवाद को संस्थागत रूप नहीं देगा?

मुस्लिम तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति

AAP नेताओं की यह मांग मुस्लिम वोट बैंक को साधने का एक प्रयास मात्र है। वे जानते हैं कि हिंदुओं की भावनाओं से खेलकर, खुद को राष्ट्रवादी दर्शाकर और मुस्लिमों को ख़ुश रखकर, वे दोनों ओर की सहानुभूति बटोर सकते हैं। लेकिन यह भारत की आंतरिक सुरक्षा के साथ खुला खिलवाड़ है।

क्या PoK को भारत में मिलाना सही समाधान है?

इसका उत्तर साफ है — नहीं। जब कश्मीर ही पूरी तरह से भारत में रहते हुए भी भारत विरोधी मानसिकता से ग्रस्त है, वहाँ के स्कूलों, कॉलेजों और मस्जिदों में कट्टरपंथ पनप रहा है, और आतंकी हमले लोकल सपोर्ट के बिना नहीं हो सकते, तो PoK को मिलाना एक घातक कदम होगा।

क्या किया जाना चाहिए?

  1. PoK को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करें: भारत को चाहिए कि PoK को अंतरराष्ट्रीय रूप से आतंकवाद के गढ़ के रूप में उजागर करे।
  2. कश्मीर में कठोर नीति लागू हो: जो राज्य खुद जिहादी मानसिकता से ग्रस्त हो, वहाँ पर विशेष प्रशासनिक तंत्र लागू हो, जिसमें आतंक समर्थकों पर कड़ी कार्रवाई हो।
  3. राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं, सैन्य रणनीति चाहिए: बयान देने से कुछ नहीं होगा। अगर PoK पर कार्रवाई करनी है तो वह सैन्य और कूटनीतिक रूप से होनी चाहिए, न कि बयानबाज़ी और राजनीतिक अवसरवादिता के तहत।

भारत से डील पक्की समझो! ट्रंप बोले – टैरिफ की बात बन रही है, जल्द कर लेंगे जबरदस्त व्यापार समझौता

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वॉशिंगटन:
अमेरिका के राष्ट्रपति और खुद को ‘बिजनेस का बाप’ मानने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने अंदाज़ में बयान दे डाला। व्हाइट हाउस के बाहर मीडियाकर्मियों से बातचीत में ट्रंप ने कहा,

“भारत से डील बहुत शानदार चल रही है… समझो हो ही गई!”

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तीन हफ्ते पहले मुलाकात हुई थी और भारत व्यापार समझौते को लेकर तैयार है। “They want the deal. We want the deal. It’s going to be tremendous!”

ट्रंप के इस बयान से एक दिन पहले अमेरिका के ट्रेज़री सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने भी कहा था कि “India deal is very close.”

ट्रंप ने 2 अप्रैल को कई देशों पर भारी टैरिफ लगाने का ऐलान किया था — जिनमें भारत और चीन शामिल थे। लेकिन 9 अप्रैल को उन्होंने 90 दिनों की छूट दी, जिसमें भारत को भी राहत मिली — सिवाय चीन और हॉन्गकॉन्ग के।

हालांकि, 10% बेसलाइन टैरिफ, और स्टील, एल्यूमिनियम और ऑटो पार्ट्स पर 25% ड्यूटी अभी भी लागू है।

ट्रंप ने कहा:

“हम कोई हल्की-फुल्की डील नहीं कर रहे — ये बहुत बड़ी डील होगी, बड़ी जीत होगी, दोनों देशों के लिए!”

बिजनेस की दुनिया के मास्टर और मीम्स के सेंटर ट्रंप ने फिर साबित किया कि वो पहले व्यापारी हैं, फिर राष्ट्रपति!

14 साल का तूफान! वैभव सूर्यवंशी ने ठोका T20 इतिहास का तूफानी शतक, रचा IPL में नया इतिहास

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जयपुर:
महज 14 साल की उम्र और बल्ला आग उगल रहा है!
राजस्थान रॉयल्स के युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी ने सोमवार को गुजरात टाइटन्स के खिलाफ ऐसी पारी खेली कि क्रिकेट इतिहास खुद हैरान रह गया। सवाई मानसिंह स्टेडियम में खेले गए मुकाबले में वैभव ने महज 35 गेंदों में शतक जड़ दिया और आईपीएल इतिहास का दूसरा सबसे तेज़ शतक अपने नाम कर लिया।

क्रिस गेल के 30 गेंदों के रिकॉर्ड के बाद, अब वैभव का नाम भी इस सूची में दर्ज हो गया है। लेकिन यही नहीं—इस युवा खिलाड़ी ने युसुफ पठान का सबसे तेज़ भारतीय T20 शतक का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया। युसुफ ने सोशल मीडिया पर उनकी तारीफों के पुल बांध दिए।

इतना ही नहीं, वैभव अब T20 क्रिकेट में शतक लगाने वाले सबसे युवा बल्लेबाज़ भी बन गए हैं। उन्होंने विजय झोल का रिकॉर्ड तोड़ा, जिन्होंने 18 साल और 118 दिनों में शतक बनाया था। वैभव ने ये कारनामा महज 14 साल और 32 दिनों की उम्र में कर दिखाया।

मैच के बाद वैभव ने कहा,

“बहुत अच्छा लग रहा है। ये मेरा पहला IPL शतक है और तीसरी पारी में ही आ गया। जो प्रैक्टिस की थी, उसका नतीजा आज दिखा। मैं बस गेंद देखता हूँ और खेलता हूँ। यशस्वी भाई के साथ बैटिंग करने में बहुत मजा आता है, वो हमेशा पॉजिटिव बातें करते हैं। डर नाम की कोई चीज़ नहीं है।”

वैभव ने इस मैच में 38 गेंदों पर 101 रन की आतिशी पारी खेली, जिसमें उन्होंने बाउंड्री पर बाउंड्री लगाकर गुजरात के गेंदबाज़ों की धज्जियां उड़ा दीं। उनके दम पर राजस्थान ने 210 रनों के लक्ष्य को बखूबी चेज़ किया।

वैभव ने पहले ही मैच में सबसे युवा IPL डेब्यू करने वाले खिलाड़ी का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया था—जब उन्होंने 14 साल और 23 दिनों की उम्र में लखनऊ सुपर जायंट्स के खिलाफ पदार्पण किया।

इस शेर के लिए ये तो बस शुरुआत है। IPL को मिला है उसका अगला सुपरस्टार – और भारत को भविष्य का धुरंधर।

“धंधा खराब? पाकिस्तान फिर ले आया ‘टूरिज़्म टर्मिनेटर’ पैकेज!”

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“पाकिस्तान टूरिज़्म बोर्ड” की एक और शानदार पेशकश!
इस बार टारगेट – पहलगाम, कश्मीर।
26 बेगुनाहों की जान लेकर, फिर साबित कर दिया कि अगर कहीं टूरिज़्म फले-फूले नहीं देखा जाता, तो वो पाकिस्तान है।

गुरेज़, जो कभी एक शांत, खूबसूरत ट्रेकिंग डेस्टिनेशन था – आज वीरान पड़ा है। होटल खाली, गेस्ट हाउस बंद, और स्थानीय लोग फिर से बेरोजगारी की तरफ लौटते हुए। कर्ज़ में डूबे होटल मालिक अब शायद सोच रहे होंगे कि “हमें ट्रेकिंग नहीं, आतंक की तैयारी करनी चाहिए थी।”

2021 में जब भारत और पाकिस्तान ने संघर्ष विराम पर सहमति जताई थी, तब लगा था कि शायद पड़ोसी को होश आ गया हो। लेकिन नहीं, पाकिस्तान की पुरानी आदतें और नए आतंकी भेजने की भूख कम कहाँ होती है?

“पर्यटन बढ़ रहा था? तोड़ दो! लोग खुश हो रहे थे? बम फोड़ दो!”
यही है इस ‘शांति-प्रिय’ देश की असली नीति।

गुरेज़, उरी, बंगस, माछिल – इन सब इलाकों को पहली बार लोगों ने शांति में जीते देखा। स्थानीय लोगों ने होटल, होमस्टे, टेंट लगाकर रोज़गार कमाया। 2023 में 1.1 लाख टूरिस्ट आए थे। अब? सब बुकिंग्स रद्द, सड़कें सूनी, और पाकिस्तान फिर से वही पुराना गाना गा रहा है – “हम तो खुद पीड़ित हैं।”

सवाल ये है – जब भी कश्मीर में शांति की हल्की सी किरण दिखती है, तब पाकिस्तान को क्यों मिर्ची लगती है? शायद इसलिए कि शांति से उसका ‘स्टार्टअप मॉडल’ – आतंकवाद – ठप पड़ जाता है?

पाकिस्तान को चाहिए एक नया स्लोगन:
“जहाँ देखो टूरिस्ट, वहाँ भेजो टेररिस्ट!”

भारत ने अब इंदुस वॉटर ट्रीटी रोकी, अटारी-वाघा बंद किया, और पाकिस्तानी नागरिकों को देश छोड़ने को कहा। लेकिन क्या वाकई पाकिस्तान को फर्क पड़ता है? शायद नहीं। क्योंकि उसे फर्क सिर्फ तब पड़ता है जब उसके भेजे गए आतंकियों को वापस “72 हूरों” की एक्सप्रेस डिलीवरी नहीं मिलती।

कश्मीर के लोग अब कह रहे हैं:
“हमें हिमालय की ठंड मंज़ूर है, लेकिन पाक-प्रायोजित आतंक की आग नहीं।”

“जिसने बेटा देश पर वार दिया, उसे देश ने बार्डर पर खड़ा कर दिया!

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ये कहानी है उस मां की…
जिसके बेटे ने जान दी, तिरंगा ओढ़ा,
और शौर्य चक्र पा गया।
लेकिन उस मां को मिला?
“डिपोर्टेशन ऑर्डर”!


शमीमा अख्तर।
नाम याद रखिए।
वही मां हैं, जिन्हें राष्ट्रपति ने
गले लगाकर शौर्य चक्र सौंपा था।
पीछे प्रधानमंत्री बैठे थे,
रक्षा मंत्री भी थे।
ताली बजी, वीडियो वायरल हुआ,
लेकिन अब… सरहद पार भेजने का आदेश आ गया।


वजह?

क्योंकि उनके बेटे मुदस्सिर अहमद शेख
ने पाकिस्तान से आए आतंकियों से लड़ते हुए
जान गंवाई थी,
और अब उसी पाकिस्तान से आए होने के नाम पर
उनकी मां को पाकिस्तान भेजा जा रहा है।

वाह रे नीति, वाह रे न्याय।


“जो पाकिस्तानी नहीं, वो भी पाकिस्तानी बना दिए गए!”

उनकी भाभी, यानी मुदस्सिर की मां,
45 साल से यहीं रह रही हैं।
कब आईं? 1990 से पहले।
कब ब्याही गईं? PoK से — जो हमारा ही हिस्सा है।

तो क्या अब PoK की शादी को भी
‘घुसपैठ’ माना जाएगा?


“सरकार बताओ — आतंक के खिलाफ हो या इंसानियत के?”

  • आतंकवादियों को मारा गया,
    उसका खामियाजा मां ने भी भुगता।

  • शौर्य चक्र मिला,
    अब वो भी वापिस लेना है क्या?


“जब बेटा वतन पर मिटा, तब मां ‘अपनी’ थी…

अब जिंदा है, तो ‘पराई’?”**

क्या ये है ‘राष्ट्रवाद’?
जहां तिरंगे में लिपटी लाश को अपनाते हैं,
पर उसके खून से जुड़े रिश्तों को सरहद पार फेंक देते हैं?


राजनीति या बदले की भावना?

पहलगाम में हमला हुआ।
बर्बर था, नृशंस था।
लेकिन जवाब में अगर आपने
शहीद की मां तक को देशद्रोही बना दिया,
तो आतंकियों और नीति-निर्माताओं में फर्क क्या रह गया?


🧵 अब सवाल सीधा है:

  • क्या 45 साल की नागरिकता भावनाओं से तय नहीं होती?

  • क्या तिरंगे से ज्यादा ‘वीजा’ का कागज़ मायने रखता है?

  • क्या सरकार को इतना भी नहीं पता कि PoK भारत का हिस्सा है,
    तो वहां से आई बहू ‘विदेशी’ नहीं हो सकती?


🔊 **”मोदी जी, शाह साहब, आप गले लगाकर शौर्य चक्र देते हैं,

और उसी मां को बॉर्डर भेजते हैं?”**

आप आए थे, घर पर।
अमित शाह जी ने दो बार मुलाकात की।
अब परिवार दर-दर की ठोकरें खा रहा है,
क्योंकि आपके आदेश में इंसान नहीं, केवल ‘देश’ लिखा है।


क्या प्रेम अपराध बन गया है?

एक और पाकिस्तानी महिला —
CRPF जवान से शादी की थी।
अब उसे भी भेजा जा रहा है।

“हम आतंकवाद की निंदा करते हैं,” वो कहती है,
“पर परिवार तो रहने दो!”


तो अब तय है:

  • प्यार सरहद नहीं देखता, पर अफसर देखते हैं।

  • बलिदान सरहद नहीं मांगता, पर सरकार मांगती है।

  • शहीद की मां तक अगर ‘डिपोर्ट’ हो सकती है,
    तो देश अब सिर्फ माटी नहीं,
    एक मशीनी फॉर्म बन चुका है।

“26 लाशें और संसद की चुप्पी: क्या अब भी ‘विशेष सत्र’ मांगना पड़ेगा?”

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26 लोग मारे गए।
पर्यटक थे — हथियार नहीं, कैमरे लेकर आए थे।
कश्मीर की वादियों में शांति ढूंढने आए थे।
और लौटे… तिरंगे में लिपटे हुए।


इस पर भी अगर संसद खामोश रहे,
तो सवाल बनता है:
“क्या संसद अब सिर्फ चुनावी भाषणों की मंडी बनकर रह गई है?”


कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सरकार से
विशेष सत्र बुलाने की मांग की है।
याद दिलाया — 1994 का वो ऐतिहासिक प्रस्ताव,
जिसमें पाकिस्तान की घुसपैठ और आतंक को लेकर
दोनों सदनों ने एकजुटता दिखाई थी।


क्या अब फिर वही वक्त नहीं आ गया?

  • जब संसद ये दोहराए कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है।

  • जब पाकिस्तान को दो टूक कहा जाए —
    “जो जमीन तूने कब्जाई है, उसे खाली कर!”

  • जब यह दिखाया जाए कि हम सिर्फ बोलते नहीं, करते भी हैं।


मगर अब संसद क्यों चुप है?

क्योंकि:

लोकसभा TV में कैमरा है, पर संवेदना नहीं।
राज्यसभा में कुर्सियाँ गर्म हैं, पर हिम्मत ठंडी।
ट्रेंडिंग में ‘मणिपुर’, ‘शिंदे’, और ‘सेल्फी’ है,
पर ‘पहलगाम’ कहीं नहीं।


 **क्या विपक्ष को भी अब लाशों की गिनती करनी पड़ेगी…

ताकि संसद जागे?**

क्या अब राहुल गांधी और खड़गे को
पीएम को चिट्ठी लिखकर याद दिलाना पड़ेगा कि,
“देश के अंदर जो नरसंहार हुआ है, उस पर संसद में चर्चा होनी चाहिए?”


कौन डर रहा है?

सरकार कहेगी:
“राष्ट्रीय सुरक्षा पर राजनीति न करें…”
पर सवाल ये है —
“जब आतंकवाद राजनीति से नहीं डरता,
तो राजनीति आतंकवाद से क्यों डरे?”


 **’विशेष सत्र’ नहीं,

‘विशेष साहस’ की ज़रूरत है,
जो ना सत्ता में दिख रहा है,
ना सड़क पर।**

“शबनम परवीन: ‘बेटी पढ़ाओ, जिहाद सिखाओ’ का नया चेहरा?

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जब हम सब “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” के नारे में उलझे हुए थे,
तब कहीं झारखंड की गलियों में शबनम परवीन
डार्क वेब से जिहाद की ऑनलाइन क्लास चला रही थी।

उम्र? सिर्फ 20 साल।
काम? हिज्ब उत-तहरीर की हैंडलर।
लक्ष्य? देश तोड़ना, मजहब के नाम पर आग लगाना।

अब तो सवाल उठता है —
“ये कैसी शिक्षा ली थी इसने, कि किताब की जगह कट्टरता पढ़ी, और कलम की जगह बंदूक थामी?”


🔴 ATS का खुलासा:

  • मोबाइल से मिली ऐसी जानकारी कि SP तक सन्न रह गए।

  • डार्क वेब, हथियारों की डीलिंग, धार्मिक कट्टरता,
    और युवाओं को भड़काने का पूरा मास्टरप्लान मोबाइल में था।

मतलब शबनम कोई मासूम लड़की नहीं,
बल्कि सोशल मीडिया पर घात लगाकर बैठी ‘जिहादी इंफ्लुएंसर’ थी।


🔥 लव जिहाद का लेवल अपग्रेड:

अब सिर्फ लड़कों से ही नहीं,
लड़कियों से भी जिहाद फैलवाया जा रहा है।

  • शबनम ने पहले अपने पति अयान को ब्रेनवॉश किया,

  • फिर उसके साथ मिलकर 15-20 साल के युवाओं को।

  • और फिर देश को जहर परोसने का टारगेट मिशन शुरू।


🧨 ‘बेटी’ शब्द का सबसे घटिया इस्तेमाल:

जब पुलिस ने गिरफ़्तार किया,
तो एक खास तबका तुरंत बोला:
“अरे, वो तो एक बच्ची है… औरत है…!”

वाह री इंसानियत!
जब यही औरत डार्क वेब से जिहाद फैलाए,
हथियारों की खरीद-फरोख्त करे,
युवाओं को उकसाए,
देशद्रोही साहित्य पढ़े और फैलाए,
तब भी तुम इसे मासूम कहोगे?

तो फिर कसाब भी बच्चा ही था!


🛑 अब सवाल विपक्ष से भी है:

ATS की रिपोर्ट के मुताबिक,
“शबनम का कुछ संपर्क विपक्षी नेताओं से भी हो सकता है।”

तो क्या कट्टरता के इस एजेंडे में कुछ नेता भी शामिल हैं?
क्या वोटबैंक की भूख इतनी गहरी है कि
देशद्रोहियों से भी हाथ मिलाया जा सकता है?


📜 साथ ही ज़ब्त हुए:

  • दो हाई-क्वालिटी हथियार

  • देशविरोधी साहित्य

  • हिंसक आंदोलन की स्क्रिप्ट

  • “शांति नहीं, दंगे चाहिए” की रणनीति


🤡 अब अगली बार जब कोई कहे – “इस्लाम खतरे में है”,

तो पूछिए –
“क्यों? क्योंकि 20 साल की शबनम जेल चली गई?”

या
क्योंकि अब देश जाग रहा है,
और हर नकाब के पीछे की हकीकत बेनकाब हो रही है?

महबूबा मुफ्ती को दर्द तब होता है, जब दर्द पाकिस्तान को हो – हिंदुस्तान जाए भाड़ में!

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जब देश 22 अप्रैल को टूरिस्टों के खून से लाल हुआ,
जब कश्मीर की वादियाँ गोलियों की आवाज़ से दहलीं,
जब निर्दोष लोग – हनीमून पर गए जोड़े, गाइड, व्यापारी –
जिहाद का शिकार बने…
तब महबूबा मुफ्ती चुप थीं।
न आँसू, न ट्वीट, न इंसानियत।

लेकिन जैसे ही बात आई पाकिस्तानी महिलाओं को देश से निकालने की,
तो ये औरत अचानक “इंसानियत की आइकॉन”, “सद्भावना की देवी” बन बैठीं।

क्यों? क्योंकि मामला पाकिस्तान का है।

ये वही महिलाएं हैं जो 2010 की पुनर्वास योजना के तहत
कश्मीरी “भटके हुए नौजवानों” (a.k.a. पाकिस्तानी ट्रेनिंग लेकर लौटे आतंकी)
के साथ इंडिया में घुसीं —
और फिर बदले में देश को दिया जनसंख्या का बम, कट्टर सोच, और अंधी नफरत।

अब वही Mehbooba ‘Pak-Premi’ Mufti कहती हैं:
“ये महिलाएं अब भारतीय समाज का हिस्सा हैं।”
कौनसे समाज का? जिहाद एक्सप्रेस का?

🔴 30-40 साल से देश में रहना कोई वीजा नहीं होता।
🔴 10-10 बच्चों की फौज पैदा करना कोई वफादारी का सबूत नहीं होता।
🔴 शांति का ढोंग करते हुए आतंक की जड़ें फैलाना देशभक्ति नहीं होती।


🛑 महबूबा मुफ्ती की इंसानियत का रिपोर्ट कार्ड:

✅ पाकिस्तान के अवैध नागरिकों के लिए आंसू
❌ भारतीय पीड़ितों के लिए एक शब्द नहीं
✅ घुसपैठियों को नागरिकता दिलाने की मांग
❌ कश्मीरी हिंदुओं की वापसी पर चुप्पी
✅ जिहादी पत्नियों के लिए कानून बदलवाना
❌ देश की सुरक्षा एजेंसियों को लगातार कटघरे में खड़ा करना

महबूबा का एजेंडा सीधा है:

  1. कश्मीर को फिर से अलगाववाद की आग में झोंको

  2. पाकिस्तान से आए “प्यार के सौदागर” को देश में बसाओ

  3. जनसंख्या बम का इस्तेमाल करो

  4. और फिर देश के संविधान को “अमानवीय” बताकर,
    जेहादी एजेंडे को मानवाधिकार बना दो!

पाकिस्तान ने भारतीयों के वीजा रद्द किए — जैसे कोई वहां घूमने का सपना देख रहा था!

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पाकिस्तान ने भारतियों के लिए वीज़ा सस्पेंड कर दिए।
वाह भई! जैसे हर सुबह भारतीय उठते ही कहते हों, “चलो यार इस बार छुट्टियाँ आतंकिस्तान में मनाते हैं!”

सच में, एक ऐसा देश जहां आतंकी खुलेआम घूमते हैं, सेना खुद आतंकियों की गाइड बनती है, और जिसे पूरी दुनिया FATF की ग्रे लिस्ट में घुमा चुकी है — वहां वीजा कौन मांग रहा था?

हमें वीज़ा चाहिए पाकिस्तान का?
भाई, हम तो स्विट्ज़रलैंड जाते हैं, मालदीव घूमते हैं, और कश्मीर जैसी जन्नत हमारे अपने देश में है।
तुम्हारे लाहौर या कराची में न बिजली ढंग की होती है, न शांति।
और ऊपर से हिंदू-विरोधी नफरत और जेहादी मानसिकता फ्री में मिलती है।

पाकिस्तान ने एयरस्पेस बंद कर दिया, ट्रेड सस्पेंड किया, और इंडियन डिप्लोमेट्स निकाल दिए —
मतलब खुद जलकर राख हो रहे हो, और हमें धुआँ दिखा रहे हो!

सच्चाई ये है:
ना हमें तुम्हारे वीज़ा की जरूरत है, ना तुम्हारे झूठे भाईचारे की।
जो मुल्क खुद को ही बचा नहीं पा रहा, वो हमें रोककर क्या ही हासिल कर लेगा?

पाकिस्तान, तुम जितना दूर रहो, उतना ही अच्छा है — तुम हो ही Toxic!

भारत बनाम पाकिस्तान: जहां हम सेना पर खर्च करते हैं, वहां तुम बस शोर मचाते हो!

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2024 के आंकड़े फिर वही सच्चाई सामने लेकर आए — भारत का सैन्य खर्च पाकिस्तान से 9 गुना ज्यादा है। जी हां, SIPRI रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने 86.1 अरब डॉलर खर्च किए, जबकि पाकिस्तान ने बेचारे 10.2 अरब डॉलर में काम चलाया।

यानी साफ कहें तो — भारत का सैन्य बजट देख पाकिस्तान का बजट ऐसा लगता है जैसे कोई बच्चा गुल्लक तोड़कर तोहफा खरीदने निकला हो।

जब हम फाइटर जेट्स, मिसाइल डिफेंस और अत्याधुनिक तकनीक पर निवेश कर रहे हैं, तब पाकिस्तान टोकन पर पुराने टैंक और ट्रैक्टर रिपेयर करवा रहा है।

भारत दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश है। पाकिस्तान? कहीं लिस्ट में भी ठीक से नहीं आता — बस हर बार ‘एटमी ताकत’ का पुराना कैसेट बजा कर खुद को तसल्ली दे लेते हैं।

यही नहीं — जब हमारी सेना ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करती है, तो पाकिस्तान संसद में ‘हाय हाय’ कर बिलखता है। जब हम राफेल खरीदते हैं, तो इनके टीवी ऐंकर “आसमान फाड़ देंगे” की डींगे मारते हैं।

हकीकत ये है कि अगर खर्च की बात करें तो —
भारत का सिर्फ एक सैन्य कमांड का बजट, पाकिस्तान की पूरी सेना से बड़ा है।
तो अगली बार जब कोई ‘दुस्साहस’ का सपना देखो, तो याद रखना —
हमारी सेना सिर्फ बजट में ही नहीं, हौसले में भी 9 गुना भारी है।

जय हिंद!

चीन का ‘स्विफ्ट एंड फेयर’ फार्मूला: आतंक फैलाओ, मगर जांच भी ‘न्यायपूर्ण’ हो?

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बीजिंग से एक और बेशर्मी भरा बयान आया है: चीन ने भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव को “शांत” करने के लिए ‘त्वरित और निष्पक्ष’ जांच की मांग की है। जी हां, वही चीन, जो खुद उइगर मुस्लिमों को कैंपों में ठूंसता है, तिब्बत और हांगकांग को रौंदता है, और अपने नागरिकों को ‘सोचने’ तक की आज़ादी नहीं देता — वही अब ‘न्याय’ और ‘शांति’ की बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है।

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि चीन “सभी उपायों का स्वागत करता है जो हालात को ठंडा करें।” बस पूछिए मत कि आतंकियों को समर्थन देना भी उन्हीं उपायों में आता है या नहीं।

जब उनसे पूछा गया कि क्या चीन जांच में भाग लेगा, तो उन्होंने उतनी ही सफाई से बात घुमा दी जितनी सफाई से चीन दक्षिण चीन सागर के नक्शे बदलता है। और पाकिस्तान के आतंकवाद को लेकर सवाल? सीधा जवाब देने से बेहतर उन्हें मौन रहना लगा।

सच कहें तो, जब चीन निष्पक्षता और शांति की बातें करता है, तो यह वैसा ही है जैसे लोमड़ी मुर्गियों के संरक्षण की शपथ ले रही हो। ‘आयरन ब्रदर’ पाकिस्तान को बचाते-बचाते अब खुद भी हास्यास्पद दिखने लगे हैं।

चीन ने हमेशा की तरह पाकिस्तान के ‘संप्रभुता और सुरक्षा हितों’ की रक्षा का समर्थन किया है — और ये वही पाकिस्तान है जो खुलेआम आतंकवादियों को पालता है और भारत में हमले करवाता है।

भारत द्वारा सिंधु जल संधि (IWT) निलंबित करने और राजनयिक संबंध घटाने के फैसले पर चीन कुछ नहीं बोला, क्योंकि जब अपने प्यारे ‘ब्रदर’ की हालत खराब हो रही हो तो चुप रहना ही रणनीति होती है।

साफ है — जब भी आतंकवाद का मामला आता है, चीन का फार्मूला यही रहता है:
“आंख बंद करो, पाकिस्तान की पीठ थपथपाओ, और दुनिया को नैतिकता पर भाषण दो।”

हमें भी चीन के इस ‘फेयर’ रवैये से वही प्रेरणा मिलती है जो किसी बकरी को भेड़िए के भरोसे छोड़ने से मिलती है।

पुलवामा जैसा हमला फिर दोहराया, 1000 से ज्यादा भारतीयों ने पाकिस्तान छोड़ा, लेकिन सवाल कायम: जब पाकिस्तान भारत से नफरत करता है, तो इनके लोग यहां क्यों आते हैं?

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पुलवामा जैसा हमला फिर दोहराया, 1000 से ज्यादा भारतीयों ने पाकिस्तान छोड़ा, लेकिन सवाल कायम: जब पाकिस्तान भारत से नफरत करता है, तो इनके लोग यहां क्यों आते हैं?

Hindi Body:
पाकिस्तान में पंजीकृत 1000 से अधिक भारतीय नागरिकों ने पिछले छह दिनों में वाघा बॉर्डर के जरिए भारत लौटना शुरू कर दिया है। यह कदम तब उठाया गया जब पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा रद्द कर दिए। इसी दौरान पाकिस्तान ने भी भारतीयों के लिए SAARC वीजा छूट योजना रद्द कर दी।

हमले की जिम्मेदारी ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) ने ली, जो पाकिस्तान स्थित प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक मुखौटा है। एक बार फिर साबित हो गया कि पाकिस्तान की जमीन पर पल रहे आतंकी भारत में खून-खराबा फैलाने के इरादे से प्रशिक्षित और सक्रिय हैं।

भारत सरकार ने तत्परता दिखाते हुए वाघा-अटारी बॉर्डर को तत्काल प्रभाव से बंद किया और पाकिस्तानी नागरिकों के सभी वीजा रद्द कर दिए। मेडिकल वीजा को भी सीमित समय के लिए ही वैध रखा गया है। भारत में पाकिस्तानी नागरिकों की एंट्री अब लगभग पूरी तरह बंद कर दी गई है।

लेकिन बड़ा सवाल यही है: जब पाकिस्तान का हर स्तर पर भारत के प्रति घृणा स्पष्ट है, जब वहाँ के बच्चे तक भारत और भारतीयों को दुश्मन समझते हुए बड़े होते हैं, तो फिर इन जिहादी सोच वाले पाकिस्तानियों को भारत आने की अनुमति क्यों दी जाती रही? क्या यह हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं था?

पाकिस्तान में पलने वाली नफरत की संस्कृति से कोई भी पाकिस्तानी अछूता नहीं है। वहाँ आतंकवाद, कट्टरता और भारत विरोध की मानसिकता बच्चों तक में भरी जाती है। ऐसे माहौल में पले-बढ़े लोगों से दोस्ती की उम्मीद करना खुद को धोखा देने जैसा है।

भारत को अब एक सख्त नीति अपनानी चाहिए: जो राष्ट्र भारत से नफरत करता है, उसके नागरिकों के लिए हमारी सीमाएं हमेशा के लिए बंद होनी चाहिए। कोई वीजा, कोई सहूलियत नहीं। जो देश आतंक का समर्थन करता है, उसे मित्रता नहीं, कठोर अलगाव मिलना चाहिए।

यह राष्ट्रीय स्वाभिमान और सुरक्षा दोनों का सवाल है। अब कोई नरमी नहीं, कोई भ्रम नहीं।

26/11 का गुनहगार तहव्वुर राणा को मिली “रॉयल ट्रीटमेंट” — 12 दिन और बढ़ी कस्टडी, जैसे कोई वीआईपी हो!

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26/11 मुंबई हमले के आरोपी तहव्वुर हुसैन राणा की एनआईए हिरासत को अदालत ने 12 और दिनों के लिए बढ़ा दिया है। वही तहव्वुर राणा, जो पाकिस्तान के इशारे पर मुंबई में 166 निर्दोष लोगों की जान लेने की साजिश का हिस्सा था।

लेकिन आज भी, उसे एक आतंकवादी की तरह नहीं, एक विशेष विदेशी नागरिक की तरह पेश किया जा रहा है। कोर्ट में बार-बार पेशी, विशेष सुविधाएं, और उसके “अधिकारों” की चिंता — यह देखकर सवाल उठता है कि क्या भारत अब भी राष्ट्रीय सुरक्षा से ज्यादा आतंकियों के अधिकारों को महत्व दे रहा है?

यह वही भ्रष्ट व्यवस्था है, जो 2008 में कांग्रेस सरकार के अधीन मुंबई को आतंकियों के हवाले कर चुकी थी। सुरक्षा एजेंसियाँ विफल रहीं, नेताओं ने केवल खोखले बयान दिए, और आम जनता को बर्बादी झेलनी पड़ी। अब, जब तहव्वुर राणा जैसे अपराधी भारत में हैं, तो वही गलती दोहराई जा रही है।

आज की सरकार में भी, जो शिवसेना कभी मराठी अस्मिता की बात करती थी, वह अब दिल्ली की राजनीति में अपनी सुविधा देखकर चुप बैठी है। देशद्रोहियों के खिलाफ एक सख्त संदेश देने की बजाय, हम न्यायिक प्रक्रियाओं के नाम पर समय बर्बाद कर रहे हैं।

राणा जैसे आतंकियों के साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति या कानूनी ढील, 26/11 के शहीदों का अपमान है। ऐसे गद्दारों को अदालतों में घुमाने की नहीं, त्वरित और सख्त सजा देने की जरूरत है ताकि दुनिया को एक स्पष्ट संदेश मिले कि भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा।

देश को आज ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो राष्ट्रद्रोहियों के साथ “मानवाधिकार” का खेल नहीं खेले, बल्कि कड़ी कार्रवाई कर यह साबित करे कि भारत आतंक के खिलाफ पूरी मजबूती से खड़ा है।

दिल्ली से लाहौर तक — पाक दूतावास का ‘बोरिया-बिस्तर’ रवाना!

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Amritsar, April 28, 2025:

पाहलगाम हमले के बाद भारत सरकार ने पाक दूतावास के ‘महामहिम’ कर्मचारियों की गतिविधियाँ सीमित कर दीं और उनका सामान भी विदाई के लिए भेज दिया। अटारी-वाघा बॉर्डर पर भारी पुलिस सुरक्षा में ट्रक पहुंचा — जिसमें बड़े गर्व से आतंकवाद एक्सपोर्ट करने वाले ‘डिप्लोमैट्स’ का सामान भरा था।

ट्रक ड्राइवर ने बताया, “हमें दिल्ली से ये सामान बॉर्डर तक छोड़ने को कहा गया है। सबका संबंध पाक दूतावास से है।”

सुरक्षा जांच के बाद जब ट्रक बॉर्डर पार कर रहा था, तो देखने वालों के चेहरों पर हल्की मुस्कान थी — सोच रहे थे कि चलो अच्छा हुआ, कुछ ‘पढ़े-लिखे जिहादी’ भी वापस अपने देश जा रहे हैं।

पाक दूतावास में नौकरी का शायद एक ही योग्यता प्रमाणपत्र होता है — “भाषण दो, भारत को गालियाँ दो, आतंकवाद फैलाओ, और खुद अंग्रेजी में तीन लाइनें भी न जोड़ पाओ।”

वैसे भी, जिनके दूतावास में भी पढ़े-लिखे के बजाय अर्धशिक्षित मौलवी टाइप अधिकारी बैठें हों, उनसे कूटनीति की उम्मीद करना वैसे ही है जैसे ऊंट से फॉर्मूला-1 रेस जिताने की उम्मीद करना।

कुल मिलाकर, दिल्ली ने साफ संदेश दे दिया — अब न आतिथ्य बचेगा, न सहनशीलता।
“टाटा, बाय बाय, वाघा बॉर्डर वाले भाई!”